Correct Answer:
Option C - अभिज्ञानशाकुन्तलनाटकस्य मङ्गलाचरणे अष्टविधशिव-स्वरूपं अस्ति।
अर्थात् अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के मङ्गलाचरण में अष्टविध (जलादि अष्ट मूर्तियों से युक्त) शिव का स्वरूप है। महाकवि कालिदास द्वारा विरचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के निर्विघ्न समाप्ति हेतु आशीर्वादात्मक मङ्गलाचरण में अष्टमूर्ति भगवान् शिव का स्मरण किया है- ‘प्रत्यक्षाभि: प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीश:’ जिसमें आदि (प्रथम) जलरूप मूर्ति है ‘या सृष्टि:स्रष्टुराद्या’ अन्य अग्निरूप मूर्ति, यजमानरूप मूर्ति, सूर्य और चन्द्रमारूपी मूर्ति, आकाशरूपमूर्ति, पृथ्वीरूपमूर्ति तथा वायुरूपमूर्ति ये शिव की आठ मूर्तियाँ हैं, इसमें पत्रावलीनान्दी है। ‘उत्तररामचरितम्’ के मङ्गलाचरण में वाणी-देवता (वाग्देवता), मुद्राराक्षस तथा ‘मालविकाग्निमित्रम्’ में भी ‘शिव’ की स्तुति की गयी है।
C. अभिज्ञानशाकुन्तलनाटकस्य मङ्गलाचरणे अष्टविधशिव-स्वरूपं अस्ति।
अर्थात् अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के मङ्गलाचरण में अष्टविध (जलादि अष्ट मूर्तियों से युक्त) शिव का स्वरूप है। महाकवि कालिदास द्वारा विरचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के निर्विघ्न समाप्ति हेतु आशीर्वादात्मक मङ्गलाचरण में अष्टमूर्ति भगवान् शिव का स्मरण किया है- ‘प्रत्यक्षाभि: प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीश:’ जिसमें आदि (प्रथम) जलरूप मूर्ति है ‘या सृष्टि:स्रष्टुराद्या’ अन्य अग्निरूप मूर्ति, यजमानरूप मूर्ति, सूर्य और चन्द्रमारूपी मूर्ति, आकाशरूपमूर्ति, पृथ्वीरूपमूर्ति तथा वायुरूपमूर्ति ये शिव की आठ मूर्तियाँ हैं, इसमें पत्रावलीनान्दी है। ‘उत्तररामचरितम्’ के मङ्गलाचरण में वाणी-देवता (वाग्देवता), मुद्राराक्षस तथा ‘मालविकाग्निमित्रम्’ में भी ‘शिव’ की स्तुति की गयी है।