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Q: कस्मिनुदाहरणे चतुर्थी विभक्ति:?
  • A. अश्वात् बालक: अपतत्।
  • B. बालक: दुर्जनात् बिभेति।
  • C. तस्यै कन्यायै फलं यच्छ।
  • D. का कन्यां पश्यसि?
Correct Answer: Option C - ‘तस्यै कन्यायै फलं यच्छ’ उदाहरणे चतुर्थी विभक्ति:। ‘कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम्’ सूत्र के अनुसार- दान कर्म से कर्ता जिसको प्रसन्न करना चाहता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है और ‘सम्प्रदाने चतुर्थी’ से सम्प्रदान की चतुर्थी विभक्ति होती है। यहाँ पर कन्या को फल देने की बात की जा रही है। अत: ‘तस्यै कन्यायै’ में चतुर्थी विभक्ति है ‘अश्वात् बालक: अपतत्।’ अश्वात् में ‘ध्रुवमपायेऽपादानम्’ से अपादान संज्ञा तथा अपादाने पञ्चमी से पञ्चमी विभक्ति हुई। ‘बालक: दुर्जनात् बिभेति’ के ‘दुर्जनात्’ में ‘भीत्रार्थानां भयहेतु:’ सूत्र से अपादान संज्ञा और अपादाने पञ्चमी से पञ्चमी विभक्ति हुई है तथा ‘का कन्यां पश्यसि’ के ‘कन्यां’ में ‘कर्मणि द्वितीया’ से द्वितीया विभक्ति हुई है।
C. ‘तस्यै कन्यायै फलं यच्छ’ उदाहरणे चतुर्थी विभक्ति:। ‘कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम्’ सूत्र के अनुसार- दान कर्म से कर्ता जिसको प्रसन्न करना चाहता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है और ‘सम्प्रदाने चतुर्थी’ से सम्प्रदान की चतुर्थी विभक्ति होती है। यहाँ पर कन्या को फल देने की बात की जा रही है। अत: ‘तस्यै कन्यायै’ में चतुर्थी विभक्ति है ‘अश्वात् बालक: अपतत्।’ अश्वात् में ‘ध्रुवमपायेऽपादानम्’ से अपादान संज्ञा तथा अपादाने पञ्चमी से पञ्चमी विभक्ति हुई। ‘बालक: दुर्जनात् बिभेति’ के ‘दुर्जनात्’ में ‘भीत्रार्थानां भयहेतु:’ सूत्र से अपादान संज्ञा और अपादाने पञ्चमी से पञ्चमी विभक्ति हुई है तथा ‘का कन्यां पश्यसि’ के ‘कन्यां’ में ‘कर्मणि द्वितीया’ से द्वितीया विभक्ति हुई है।

Explanations:

‘तस्यै कन्यायै फलं यच्छ’ उदाहरणे चतुर्थी विभक्ति:। ‘कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम्’ सूत्र के अनुसार- दान कर्म से कर्ता जिसको प्रसन्न करना चाहता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है और ‘सम्प्रदाने चतुर्थी’ से सम्प्रदान की चतुर्थी विभक्ति होती है। यहाँ पर कन्या को फल देने की बात की जा रही है। अत: ‘तस्यै कन्यायै’ में चतुर्थी विभक्ति है ‘अश्वात् बालक: अपतत्।’ अश्वात् में ‘ध्रुवमपायेऽपादानम्’ से अपादान संज्ञा तथा अपादाने पञ्चमी से पञ्चमी विभक्ति हुई। ‘बालक: दुर्जनात् बिभेति’ के ‘दुर्जनात्’ में ‘भीत्रार्थानां भयहेतु:’ सूत्र से अपादान संज्ञा और अपादाने पञ्चमी से पञ्चमी विभक्ति हुई है तथा ‘का कन्यां पश्यसि’ के ‘कन्यां’ में ‘कर्मणि द्वितीया’ से द्वितीया विभक्ति हुई है।