Correct Answer:
Option D - क्रियासु युक्तैर्नृप! चारचक्षुषो न वञ्चनीया: प्रभवोऽनुजीविभि: श्लोकेऽस्मिन् ‘‘चारचक्षुष:’’ युधिष्ठिर: अस्ति। ‘चारचक्षु’ युधिष्ठिर के लिए प्रयुक्त है। इसका वर्णन भारवि कृत किरातार्जुनीयम् से लिया गया है। इसमें कुल 18 सर्ग हैं।
D. क्रियासु युक्तैर्नृप! चारचक्षुषो न वञ्चनीया: प्रभवोऽनुजीविभि: श्लोकेऽस्मिन् ‘‘चारचक्षुष:’’ युधिष्ठिर: अस्ति। ‘चारचक्षु’ युधिष्ठिर के लिए प्रयुक्त है। इसका वर्णन भारवि कृत किरातार्जुनीयम् से लिया गया है। इसमें कुल 18 सर्ग हैं।