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Q: जो भाव मन में केवल अल्पकाल तक संचरण करके चले जाते हैं, उन्हें क्या कहा जाता है?
  • A. संचारी भाव
  • B. विभाव
  • C. अनुभाव
  • D. उपर्युक्त में से एक से अधिक
  • E. उपर्युक्त में से कोई नहीं
Correct Answer: Option A - जो भाव मन में केवल अल्पकाल तक संचरण करके चले जाते है वे संचारी भाव कहलाते है। इन्ही का दूसरा नाम व्यभिचारी भाव है। ये स्थायी भाव को पुष्ट करने के लिए आते है और तुरन्त लुप्त हो जाते है। ये लघु भाव किसी एक ही रस से बँधे नही रहते, इसी से इन्हे व्यभिचारी भाव भी कहते हैं। इनकी संख्या 33 है। • संतोष, आवेग, दैन्य, श्रम, मद, जड़ता, उग्रता, मोह, शंका, चिंता, ग्लानि, विषाद, व्याधि, आलस्य, अमर्ष, हर्ष, गर्व, असूया, धृति, मति, चापल्य, ब्रीड़ा, अवहित्था, निद्रा, स्वप्न, विवोध, उन्माद, अपस्मार, स्मृति, औत्सुक्य, त्रास, वितर्क, मरण। • देव ने 34वाँ संचारी भाव ‘छल’ को माना है।
A. जो भाव मन में केवल अल्पकाल तक संचरण करके चले जाते है वे संचारी भाव कहलाते है। इन्ही का दूसरा नाम व्यभिचारी भाव है। ये स्थायी भाव को पुष्ट करने के लिए आते है और तुरन्त लुप्त हो जाते है। ये लघु भाव किसी एक ही रस से बँधे नही रहते, इसी से इन्हे व्यभिचारी भाव भी कहते हैं। इनकी संख्या 33 है। • संतोष, आवेग, दैन्य, श्रम, मद, जड़ता, उग्रता, मोह, शंका, चिंता, ग्लानि, विषाद, व्याधि, आलस्य, अमर्ष, हर्ष, गर्व, असूया, धृति, मति, चापल्य, ब्रीड़ा, अवहित्था, निद्रा, स्वप्न, विवोध, उन्माद, अपस्मार, स्मृति, औत्सुक्य, त्रास, वितर्क, मरण। • देव ने 34वाँ संचारी भाव ‘छल’ को माना है।

Explanations:

जो भाव मन में केवल अल्पकाल तक संचरण करके चले जाते है वे संचारी भाव कहलाते है। इन्ही का दूसरा नाम व्यभिचारी भाव है। ये स्थायी भाव को पुष्ट करने के लिए आते है और तुरन्त लुप्त हो जाते है। ये लघु भाव किसी एक ही रस से बँधे नही रहते, इसी से इन्हे व्यभिचारी भाव भी कहते हैं। इनकी संख्या 33 है। • संतोष, आवेग, दैन्य, श्रम, मद, जड़ता, उग्रता, मोह, शंका, चिंता, ग्लानि, विषाद, व्याधि, आलस्य, अमर्ष, हर्ष, गर्व, असूया, धृति, मति, चापल्य, ब्रीड़ा, अवहित्था, निद्रा, स्वप्न, विवोध, उन्माद, अपस्मार, स्मृति, औत्सुक्य, त्रास, वितर्क, मरण। • देव ने 34वाँ संचारी भाव ‘छल’ को माना है।