Correct Answer:
Option A - उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
1. मौलिक अधिकार निरपेक्ष नहीं होते, अर्थात ये वाद योग्य होते हैं क्योंकि ये न्यायिक व्याख्याओं के अधीन हैं।
2. मौलिक अधिकार लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की सरकार के विधायी और कार्यपालक पक्षों के अतिक्रमण से रक्षा करते हैं।
3. मौलिक अधिकारों का संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय होता है। मूल अधिकारों का हनन होने पर अनु. 32 के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाया जा सकता है। साथ ही अनु. 226 के अन्तर्गत उच्च न्यायालय भी मूल अधिकारों की रक्षा का दायित्व निभाते हैं।
4. अनु. 368 के अन्तर्गत संसद संविधान संशोधन के माध्यम से मौलिक अधिकारों पर विवेकयुक्त नियंत्रण (जो संविधान की मूल संरचना के संगत हो) लगा सकती है।
5. मौलिक अधिकार आपातकालीन स्थिति में निलंबित किये जा सकते हैं। परन्तु अनु. 20(अपराधों की दोषसिद्धि के विषय में संरक्षण) तथा अनु. 21 (प्राण व दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) को आपातकाल में भी निलंबित नहीं किया जा सकता है।
A. उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
1. मौलिक अधिकार निरपेक्ष नहीं होते, अर्थात ये वाद योग्य होते हैं क्योंकि ये न्यायिक व्याख्याओं के अधीन हैं।
2. मौलिक अधिकार लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की सरकार के विधायी और कार्यपालक पक्षों के अतिक्रमण से रक्षा करते हैं।
3. मौलिक अधिकारों का संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय होता है। मूल अधिकारों का हनन होने पर अनु. 32 के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाया जा सकता है। साथ ही अनु. 226 के अन्तर्गत उच्च न्यायालय भी मूल अधिकारों की रक्षा का दायित्व निभाते हैं।
4. अनु. 368 के अन्तर्गत संसद संविधान संशोधन के माध्यम से मौलिक अधिकारों पर विवेकयुक्त नियंत्रण (जो संविधान की मूल संरचना के संगत हो) लगा सकती है।
5. मौलिक अधिकार आपातकालीन स्थिति में निलंबित किये जा सकते हैं। परन्तु अनु. 20(अपराधों की दोषसिद्धि के विषय में संरक्षण) तथा अनु. 21 (प्राण व दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) को आपातकाल में भी निलंबित नहीं किया जा सकता है।