Explanations:
गुप्तकाल में वाणिज्यिक निकायों को उनके वास्तविक कार्य या स्वरूप के आधार पर विभाजन हुआ था। व्यापारियों की एक समिति होती थी जिसे निगम कहा जाता था। निगम का प्रधान श्रेष्ठि कहलाता था, व्यापारियों के समूह को सार्थ तथा उनके नेताओं को सार्थवाह कहा जाता था। नगर श्रेष्ठिन बैंकरों एवं साहूकार के रूप में कार्य करते थे।