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निम्नलिखित गंद्याश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए: इस रत्नगर्भा वसुंधरा के अंत:स्थल में हीरे-मणि-माणिक्य और सम्पदा का अभाव नहीं है। धरती का विस्तीर्ण अतल गर्भ अनंत धनराशि से भरा पड़ा है। आवश्यकता है, इसके वक्ष को चीरकर उन्हें उगलवा लेने वाले दृढ़ संकल्प और साहस की। धरती के अंदर विद्यमान धनराशि के कारण ही धरती वसुंधरा कहलाती है। इस धरा पर रहने वाले कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि यदि भाग्य में नहीं है तो हथेली पर आई वस्तु भी नष्ट हो जाती है। जब हम अपना चिंतन केवल भाग्यवाद को आधार मानकर करते हैं, तो हम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपेक्षित प्रयत्न नहीं करते। प्रयत्न के अभाव में फल भी नहीं मिलता और लोग भाग्य को दोष देते रहते हैं। ऐसे भाग्यवादी लोगों को कायर माना जाता है। अकूत सम्पदा तो उसी को मिल सकती है जो पूर्ण संकल्प के साथ कार्य में प्रवृत्त हो। जैसे अर्जुन का ध्यान पक्षी की बेधे जाने वाली आँख पर था, उसी प्रकार जो लक्ष्य के प्रति एकनिष्ठ होकर सतत प्रयासशील रहता है, समय के परिपक्वता के साथ उस लक्ष्य को पाने में सफल हो जाता है। ऐसे लोग जो भाग्य के सहारे बैठे रहते हैं और प्रतीक्षा करते रहते हैं कि अली बाबा की सिम-सिम वाली गुफा का द्वार कब खुलता है, उन्हें जब असफलता का अँधेरा अपने चारों ओर घिरता दिखाई देता है, तब वे पछतावा करते हैं कि उन्होंने व्यर्थ ही समय गँवा दिया। मनुष्य के पास सभी कुछ पा लेने की क्षमता होती है, पर कैसे उसे पाया जाएगा उसके लिए संपूर्ण-निर्णयशक्ति, दृढ़ संकल्प और अपेक्षित परिश्रम आवश्यक है। कई बार लक्ष्य के एकदम समीप पहुँच कर हम प्रयत्न करना छोड़ देते हैं और भाग्य को दोष देते हैं। भाग्य जैसी कोई वस्तु या तो होती ही नहीं है और या परिश्रम की चाबी के साथ मिलकर भाग्य की चाबी काम करती है। भाग्य की अकेली चाबी सफलता के ताले को नहीं खोल सकती। इसीलिए कवि तुलसीदास ने कहा है- कायर मन कर एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।। जीवन में भाग्य का फल किसको मिलता है?