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Q: भारतीय प्रतीक स्वास्तिक किससे विकसित हुआ है?
  • A. सूर्य
  • B. कमल
  • C. अग्नि
  • D. चक्र
Correct Answer: Option A - स्वास्तिक अत्यंत प्राचीनकाल से भारतीय संस्कृति में मंगल प्रतीक माना जाता रहा है। इसलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पूर्व स्वास्तिक चिन्ह अंकित कर पूजन किया जाता है। स्वास्तिक शब्द सु + अस + क से बना है ‘सु’ का अर्थ ‘अच्छा’, ‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्ता ’ या ‘करने वाले’ से है। इस प्रकार स्वास्तिक का शब्दार्थ ‘अच्छा’ या ‘मंगल’ करने वाला होता है। अमरकोश में भी स्वास्तिक का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं- ‘स्वास्तिक सर्वतोऋद्ध’ अर्थात् ‘सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।’ इस प्रकार स्वास्तिक शब्द में किसी व्यक्ति, जाति या धर्म विशेष का नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व के कल्याण या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना निहित है। ऋग्वेद की ऋचा में स्वास्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण की उपमा दी गई है।
A. स्वास्तिक अत्यंत प्राचीनकाल से भारतीय संस्कृति में मंगल प्रतीक माना जाता रहा है। इसलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पूर्व स्वास्तिक चिन्ह अंकित कर पूजन किया जाता है। स्वास्तिक शब्द सु + अस + क से बना है ‘सु’ का अर्थ ‘अच्छा’, ‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्ता ’ या ‘करने वाले’ से है। इस प्रकार स्वास्तिक का शब्दार्थ ‘अच्छा’ या ‘मंगल’ करने वाला होता है। अमरकोश में भी स्वास्तिक का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं- ‘स्वास्तिक सर्वतोऋद्ध’ अर्थात् ‘सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।’ इस प्रकार स्वास्तिक शब्द में किसी व्यक्ति, जाति या धर्म विशेष का नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व के कल्याण या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना निहित है। ऋग्वेद की ऋचा में स्वास्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण की उपमा दी गई है।

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स्वास्तिक अत्यंत प्राचीनकाल से भारतीय संस्कृति में मंगल प्रतीक माना जाता रहा है। इसलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पूर्व स्वास्तिक चिन्ह अंकित कर पूजन किया जाता है। स्वास्तिक शब्द सु + अस + क से बना है ‘सु’ का अर्थ ‘अच्छा’, ‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्ता ’ या ‘करने वाले’ से है। इस प्रकार स्वास्तिक का शब्दार्थ ‘अच्छा’ या ‘मंगल’ करने वाला होता है। अमरकोश में भी स्वास्तिक का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं- ‘स्वास्तिक सर्वतोऋद्ध’ अर्थात् ‘सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।’ इस प्रकार स्वास्तिक शब्द में किसी व्यक्ति, जाति या धर्म विशेष का नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व के कल्याण या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना निहित है। ऋग्वेद की ऋचा में स्वास्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण की उपमा दी गई है।