Correct Answer:
Option D - लैमार्कवाद का आधार ‘उपार्जित लक्षण की वंशागति’ है। 1809 में लैमार्क की किताब ‘फिलोसोफिक जूलोजिक’ में प्रकाशित हुई थी जो जीवितों के उपार्जित लक्षणों की वंशागति के रूप में प्रसिद्ध हुई।
जैव विकास परिकल्पना पर पहला तर्कसंगत सिद्धान्त फ्रांसीसी जीव वैज्ञानिक, जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क ने प्रस्तुत किया। लैमार्क वाद के चार मूल धारणाओं पर आधारित था यथा–
(i) विकास के दौरान जीवों एवं उनके अंगों के माप (size) में वृद्धि होती है।
(ii) यदि किसी जीव के नये अंग के बनने में उसकी उत्तरजीविता बढ़ सकती है, तो उस जीव में उस अंग की उत्पत्ति होती है।
(iii) जीवों के जिन अंगों का लगातार उपयोग होता रहता है, वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी और अधिक बड़े एवं पुष्ट होते जाते हैं। जबकि जीन अंगों का उपयोग नहीं अथवा बहुत कम हो रहा होता है, वे धीरे-धीरे कमजोर एवं छोटे होते जाते हैं और अन्त में उनका लोप हो जाता है।
(iv) अंगों के उपयोग एवं न उपयोग करने के कारण उत्पन्न ये परिवर्तन वंशागत होते हैं और ये समय के साथ परिणाम में बढ़ते जाते हैं यह आखिरी अवधारणा अर्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त कहलाती है।
लेकिन अब लैमार्कवाद पूरी तरह अमान्य है, और इसका केवल इतिहासिक महत्व है।
D. लैमार्कवाद का आधार ‘उपार्जित लक्षण की वंशागति’ है। 1809 में लैमार्क की किताब ‘फिलोसोफिक जूलोजिक’ में प्रकाशित हुई थी जो जीवितों के उपार्जित लक्षणों की वंशागति के रूप में प्रसिद्ध हुई।
जैव विकास परिकल्पना पर पहला तर्कसंगत सिद्धान्त फ्रांसीसी जीव वैज्ञानिक, जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क ने प्रस्तुत किया। लैमार्क वाद के चार मूल धारणाओं पर आधारित था यथा–
(i) विकास के दौरान जीवों एवं उनके अंगों के माप (size) में वृद्धि होती है।
(ii) यदि किसी जीव के नये अंग के बनने में उसकी उत्तरजीविता बढ़ सकती है, तो उस जीव में उस अंग की उत्पत्ति होती है।
(iii) जीवों के जिन अंगों का लगातार उपयोग होता रहता है, वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी और अधिक बड़े एवं पुष्ट होते जाते हैं। जबकि जीन अंगों का उपयोग नहीं अथवा बहुत कम हो रहा होता है, वे धीरे-धीरे कमजोर एवं छोटे होते जाते हैं और अन्त में उनका लोप हो जाता है।
(iv) अंगों के उपयोग एवं न उपयोग करने के कारण उत्पन्न ये परिवर्तन वंशागत होते हैं और ये समय के साथ परिणाम में बढ़ते जाते हैं यह आखिरी अवधारणा अर्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त कहलाती है।
लेकिन अब लैमार्कवाद पूरी तरह अमान्य है, और इसका केवल इतिहासिक महत्व है।