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Q: अधोऽङ्कितेषु कतमो वेदाङ्गो नास्ति?
  • A. काण्वसंहिता
  • B. धर्मसूत्राणि
  • C. निरुक्तम्
  • D. ज्योतिषम्
Correct Answer: Option A - ‘‘काण्वसंहिता वेदाङ्गो नास्ति। अर्थात् - काण्वसंहिता वेदाङ्ग नहीं है। वेदाङ्गों में शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष, इनकी गणना वेदाङ्गों में होती है। छन्द: पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते ज्योतिषामयनं चक्षु: निरुकतं श्रोत्र मुच्यते।। शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोकेमहीयते।। (पाणिनीय शिक्षा) अर्थात् - छन्द वेदरूपी पुरुष के पैर है, कल्प उसके दो हाथ है। ज्योतिष दो नेत्र है, निरूक्त दो कान है, शिक्षा नासिका है, और व्याकरण मुख है। अत: अंगों सहित वेद का अध्ययन करके ही मनुष्य ब्रह्मलोक में महिमा को प्राप्त होता है। कल्प वेदाङ्ग चार रूपों में बंटा हुआ है। (1) श्रौत सूत्र (2) गृह्यसूत्र (3) धर्मसूत्र (4) शुल्बसूत्र
A. ‘‘काण्वसंहिता वेदाङ्गो नास्ति। अर्थात् - काण्वसंहिता वेदाङ्ग नहीं है। वेदाङ्गों में शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष, इनकी गणना वेदाङ्गों में होती है। छन्द: पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते ज्योतिषामयनं चक्षु: निरुकतं श्रोत्र मुच्यते।। शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोकेमहीयते।। (पाणिनीय शिक्षा) अर्थात् - छन्द वेदरूपी पुरुष के पैर है, कल्प उसके दो हाथ है। ज्योतिष दो नेत्र है, निरूक्त दो कान है, शिक्षा नासिका है, और व्याकरण मुख है। अत: अंगों सहित वेद का अध्ययन करके ही मनुष्य ब्रह्मलोक में महिमा को प्राप्त होता है। कल्प वेदाङ्ग चार रूपों में बंटा हुआ है। (1) श्रौत सूत्र (2) गृह्यसूत्र (3) धर्मसूत्र (4) शुल्बसूत्र

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‘‘काण्वसंहिता वेदाङ्गो नास्ति। अर्थात् - काण्वसंहिता वेदाङ्ग नहीं है। वेदाङ्गों में शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष, इनकी गणना वेदाङ्गों में होती है। छन्द: पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते ज्योतिषामयनं चक्षु: निरुकतं श्रोत्र मुच्यते।। शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोकेमहीयते।। (पाणिनीय शिक्षा) अर्थात् - छन्द वेदरूपी पुरुष के पैर है, कल्प उसके दो हाथ है। ज्योतिष दो नेत्र है, निरूक्त दो कान है, शिक्षा नासिका है, और व्याकरण मुख है। अत: अंगों सहित वेद का अध्ययन करके ही मनुष्य ब्रह्मलोक में महिमा को प्राप्त होता है। कल्प वेदाङ्ग चार रूपों में बंटा हुआ है। (1) श्रौत सूत्र (2) गृह्यसूत्र (3) धर्मसूत्र (4) शुल्बसूत्र