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  • A. दिल्ली दरबार दर्पण
  • B. शिवशंभु के चिट्ठे
  • C. उठ जाग मुसाफिर
  • D. नाखून क्यों बढ़ते हैं
Correct Answer: Option D - • सफलता और चरितार्थता में अन्तर है। मनुष्य मारणास्त्रों के संचयन से , बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से उस वस्तु को पा भी सकता है, जिसे उसने बड़े आडम्बर के साथ सफलता का नाम दे रखा है।’ उपर्युक्त पंक्तियाँ हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं?’ से ली गई हैं। • ‘नाखून क्यों बढते हैं’ निबन्ध हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘कल्पलता’ (1951 ई.) निबन्ध संग्रह में संकलित है। • यह विचार-प्रधान व्यक्तिनिष्ठ निबन्ध है। इसमें नाखून का बढ़ना पशुता का प्रतीक है और नाखून का काटना मानवता का प्रतीक माना गया है। • कल्पलता निबन्ध संग्रह में 20 निबन्ध संकलित हैं। • दिल्ली दरबार दर्पण (1877 ई.) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का शिवशंभु के चिट्ठे (1907-1908 ई.) बाल मुकुंद गुप्त का तथा उठ जाग मुसाफिर (2012 ई.) विवेकी राय का निबंध है।
D. • सफलता और चरितार्थता में अन्तर है। मनुष्य मारणास्त्रों के संचयन से , बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से उस वस्तु को पा भी सकता है, जिसे उसने बड़े आडम्बर के साथ सफलता का नाम दे रखा है।’ उपर्युक्त पंक्तियाँ हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं?’ से ली गई हैं। • ‘नाखून क्यों बढते हैं’ निबन्ध हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘कल्पलता’ (1951 ई.) निबन्ध संग्रह में संकलित है। • यह विचार-प्रधान व्यक्तिनिष्ठ निबन्ध है। इसमें नाखून का बढ़ना पशुता का प्रतीक है और नाखून का काटना मानवता का प्रतीक माना गया है। • कल्पलता निबन्ध संग्रह में 20 निबन्ध संकलित हैं। • दिल्ली दरबार दर्पण (1877 ई.) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का शिवशंभु के चिट्ठे (1907-1908 ई.) बाल मुकुंद गुप्त का तथा उठ जाग मुसाफिर (2012 ई.) विवेकी राय का निबंध है।

Explanations:

• सफलता और चरितार्थता में अन्तर है। मनुष्य मारणास्त्रों के संचयन से , बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से उस वस्तु को पा भी सकता है, जिसे उसने बड़े आडम्बर के साथ सफलता का नाम दे रखा है।’ उपर्युक्त पंक्तियाँ हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं?’ से ली गई हैं। • ‘नाखून क्यों बढते हैं’ निबन्ध हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘कल्पलता’ (1951 ई.) निबन्ध संग्रह में संकलित है। • यह विचार-प्रधान व्यक्तिनिष्ठ निबन्ध है। इसमें नाखून का बढ़ना पशुता का प्रतीक है और नाखून का काटना मानवता का प्रतीक माना गया है। • कल्पलता निबन्ध संग्रह में 20 निबन्ध संकलित हैं। • दिल्ली दरबार दर्पण (1877 ई.) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का शिवशंभु के चिट्ठे (1907-1908 ई.) बाल मुकुंद गुप्त का तथा उठ जाग मुसाफिर (2012 ई.) विवेकी राय का निबंध है।