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Q: 1680 में, शिवाजी के पुत्र __________, अपने भाई राजाराम के विरुद्ध उत्तराधिकार के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद सिंहासन पर बैठे थे।
  • A. बालाजी
  • B. शाहू
  • C. संभाजी
  • D. बाजी राव प्रथम
Correct Answer: Option C - शिवाजी की मृत्यु 3 अप्रैल, 1680 ई. को हो गई। शिवाजी ने चूंकि अपनी मृत्यु के पूर्व अपने किसी भी उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की थी, अत: उनकी मृत्यु के बाद नवोदित मराठा साम्राज्य में आन्तरिक फूट पड़ गई। शिवाजी की दो मुख्य पत्नियाँ थी- सोयराबाई और सईबाई निबांलकर। शिवाजी का सईबाई निबांलकर से उत्पन्न पुत्र का नाम शम्भा जी था। जबकि सोयराबाई से उत्पन्न पुत्र का नाम राजाराम था। सोयराबाई ने शिवाजी की मृत्यु के तुरन्त बाद राजाराम को उनका उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। परन्तु शम्भा जी के बड़ा होने की वजह से शिवाजी का वास्तविक उत्तराधिकारी वही था। फलत: दोनों के बीच गद्दी के लिए संघर्ष हुआ, जिसमें अंतत: शम्भा जी विजयी रहे और 20 जुलाई, 1680 को सिंहासनारूढ़ हुए।
C. शिवाजी की मृत्यु 3 अप्रैल, 1680 ई. को हो गई। शिवाजी ने चूंकि अपनी मृत्यु के पूर्व अपने किसी भी उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की थी, अत: उनकी मृत्यु के बाद नवोदित मराठा साम्राज्य में आन्तरिक फूट पड़ गई। शिवाजी की दो मुख्य पत्नियाँ थी- सोयराबाई और सईबाई निबांलकर। शिवाजी का सईबाई निबांलकर से उत्पन्न पुत्र का नाम शम्भा जी था। जबकि सोयराबाई से उत्पन्न पुत्र का नाम राजाराम था। सोयराबाई ने शिवाजी की मृत्यु के तुरन्त बाद राजाराम को उनका उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। परन्तु शम्भा जी के बड़ा होने की वजह से शिवाजी का वास्तविक उत्तराधिकारी वही था। फलत: दोनों के बीच गद्दी के लिए संघर्ष हुआ, जिसमें अंतत: शम्भा जी विजयी रहे और 20 जुलाई, 1680 को सिंहासनारूढ़ हुए।

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शिवाजी की मृत्यु 3 अप्रैल, 1680 ई. को हो गई। शिवाजी ने चूंकि अपनी मृत्यु के पूर्व अपने किसी भी उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की थी, अत: उनकी मृत्यु के बाद नवोदित मराठा साम्राज्य में आन्तरिक फूट पड़ गई। शिवाजी की दो मुख्य पत्नियाँ थी- सोयराबाई और सईबाई निबांलकर। शिवाजी का सईबाई निबांलकर से उत्पन्न पुत्र का नाम शम्भा जी था। जबकि सोयराबाई से उत्पन्न पुत्र का नाम राजाराम था। सोयराबाई ने शिवाजी की मृत्यु के तुरन्त बाद राजाराम को उनका उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। परन्तु शम्भा जी के बड़ा होने की वजह से शिवाजी का वास्तविक उत्तराधिकारी वही था। फलत: दोनों के बीच गद्दी के लिए संघर्ष हुआ, जिसमें अंतत: शम्भा जी विजयी रहे और 20 जुलाई, 1680 को सिंहासनारूढ़ हुए।