search
Q: दुर्योधन: दण्डेन कं निहन्ति?
  • A. उपद्रवम्
  • B. अर्थबाधाम्
  • C. धर्मविप्लवम्
  • D. दण्डपारुष्यम्
Correct Answer: Option C - दुर्योधन: दण्डेन ‘धर्मविप्लवम्’ निहन्ति। इन्द्रियों को वश (नियन्त्रण) में रखने वाला वह (दुर्योधन) धन प्राप्त करने की इच्छा से नहीं और न क्रोध से (दण्ड देता है) किन्तु (लोभ, क्रोध इत्यादि) कारणों से रहित होकर यह मेरा धर्म है’ यही समझकर गुरुओं (मनु इत्यादि धर्माचार्यों) के द्वारा बतलाये गए दण्ड के द्वारा शत्रु अथवा मित्र में स्थित धर्मोल्लंघन (अधर्म) का निवारण करता है। उपर्युक्त कथन भारवि कृत किरातार्जुनीयम् से उद्धृत है। इसमें कुल 18 सर्ग है। इसके नायक-अर्जुन नायिका–द्रौपदी प्रथम सर्ग के अनुसार नायक–युधिष्ठिर हैं। सह– नायक–किरातवेषधारी (शिव) किरातार्जुनीयम् का प्रधान रस–वीर है।
C. दुर्योधन: दण्डेन ‘धर्मविप्लवम्’ निहन्ति। इन्द्रियों को वश (नियन्त्रण) में रखने वाला वह (दुर्योधन) धन प्राप्त करने की इच्छा से नहीं और न क्रोध से (दण्ड देता है) किन्तु (लोभ, क्रोध इत्यादि) कारणों से रहित होकर यह मेरा धर्म है’ यही समझकर गुरुओं (मनु इत्यादि धर्माचार्यों) के द्वारा बतलाये गए दण्ड के द्वारा शत्रु अथवा मित्र में स्थित धर्मोल्लंघन (अधर्म) का निवारण करता है। उपर्युक्त कथन भारवि कृत किरातार्जुनीयम् से उद्धृत है। इसमें कुल 18 सर्ग है। इसके नायक-अर्जुन नायिका–द्रौपदी प्रथम सर्ग के अनुसार नायक–युधिष्ठिर हैं। सह– नायक–किरातवेषधारी (शिव) किरातार्जुनीयम् का प्रधान रस–वीर है।

Explanations:

दुर्योधन: दण्डेन ‘धर्मविप्लवम्’ निहन्ति। इन्द्रियों को वश (नियन्त्रण) में रखने वाला वह (दुर्योधन) धन प्राप्त करने की इच्छा से नहीं और न क्रोध से (दण्ड देता है) किन्तु (लोभ, क्रोध इत्यादि) कारणों से रहित होकर यह मेरा धर्म है’ यही समझकर गुरुओं (मनु इत्यादि धर्माचार्यों) के द्वारा बतलाये गए दण्ड के द्वारा शत्रु अथवा मित्र में स्थित धर्मोल्लंघन (अधर्म) का निवारण करता है। उपर्युक्त कथन भारवि कृत किरातार्जुनीयम् से उद्धृत है। इसमें कुल 18 सर्ग है। इसके नायक-अर्जुन नायिका–द्रौपदी प्रथम सर्ग के अनुसार नायक–युधिष्ठिर हैं। सह– नायक–किरातवेषधारी (शिव) किरातार्जुनीयम् का प्रधान रस–वीर है।