Correct Answer:
Option C - ‘‘भई सरकारी पैसे -------------- स्टेशनरी लग जाती है’’ ‘भोलाराम का जीव’ में यह वार्तालाप ‘नारद और साहब’ नामक चरित्रों के मध्य हुआ है। हरिशंकर परसाई द्वारा रचित ‘भोलाराम का जीव’ एक व्यंग्य रचना है, जिसमें सरकारी दफ्तरों में फैले भ्रष्टाचार और लालफीताशाही पर तीखा व्यंग्य किया गया है। इस रचना के प्रमुख पात्र भोलाराम, जो एक गरीब सरकारी कर्मचारी है और नारद, जो स्वर्ग से पृथ्वी पर भोलाराम के जीव को खोजने आता है। हँसते हैं रोते हैं, पगडंडियों का जमाना, जैसे उनके दिन फिरे, सदाचार की ताबीज, शिकायत मुझे भी है, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, अपनी-अपनी बीमारी, वैष्णवा की फिसलन, विकलांग श्रद्धा का दौर, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, कहत कबीर, पाखण्ड का अध्यात्म, आवारा भीड़ के खतरे, प्रेमचंद के फटे जूते हरिशंकर परसाई द्वारा रचित महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं।
C. ‘‘भई सरकारी पैसे -------------- स्टेशनरी लग जाती है’’ ‘भोलाराम का जीव’ में यह वार्तालाप ‘नारद और साहब’ नामक चरित्रों के मध्य हुआ है। हरिशंकर परसाई द्वारा रचित ‘भोलाराम का जीव’ एक व्यंग्य रचना है, जिसमें सरकारी दफ्तरों में फैले भ्रष्टाचार और लालफीताशाही पर तीखा व्यंग्य किया गया है। इस रचना के प्रमुख पात्र भोलाराम, जो एक गरीब सरकारी कर्मचारी है और नारद, जो स्वर्ग से पृथ्वी पर भोलाराम के जीव को खोजने आता है। हँसते हैं रोते हैं, पगडंडियों का जमाना, जैसे उनके दिन फिरे, सदाचार की ताबीज, शिकायत मुझे भी है, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, अपनी-अपनी बीमारी, वैष्णवा की फिसलन, विकलांग श्रद्धा का दौर, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, कहत कबीर, पाखण्ड का अध्यात्म, आवारा भीड़ के खतरे, प्रेमचंद के फटे जूते हरिशंकर परसाई द्वारा रचित महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं।