Explanations:
‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक के लेखक जयशंकर प्रसाद हैं। इस नाटक में ध्रुवस्वामिनी के संवादों का पहले से बाद को क्रम इस प्रकार है– 1. लौट जाओ इस तुच्छ नारी-जीवन के लिए इतने महान उत्सर्ग की आवश्यकता नहीं। 2. अपनी कामना की वस्तु न पाकर यह आत्महत्या जैसा प्रसंग तो नहीं है। 3. चन्द्रे! तुम मुझे दोनों ओर से नष्ट न करो। यहाँ से लौट जाने पर भी क्या मैं गुप्तकुल के अन्त:पुर में रहने पाऊँगी। 4. चन्द्रे! मेरे भाग्य के आकाश में धूमकेतु-सी अपनी गति बंद करो। 5. तो फिर मेरा और तुम्हारा जीवन-मरण साथ ही होगा।