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  • A. A, B, D, E, C
  • B. A, E, B, D, C
  • C. B, E, A, C, D
  • D. B, A, E, D, C
Correct Answer: Option B - ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक के लेखक जयशंकर प्रसाद हैं। इस नाटक में ध्रुवस्वामिनी के संवादों का पहले से बाद को क्रम इस प्रकार है– 1. लौट जाओ इस तुच्छ नारी-जीवन के लिए इतने महान उत्सर्ग की आवश्यकता नहीं। 2. अपनी कामना की वस्तु न पाकर यह आत्महत्या जैसा प्रसंग तो नहीं है। 3. चन्द्रे! तुम मुझे दोनों ओर से नष्ट न करो। यहाँ से लौट जाने पर भी क्या मैं गुप्तकुल के अन्त:पुर में रहने पाऊँगी। 4. चन्द्रे! मेरे भाग्य के आकाश में धूमकेतु-सी अपनी गति बंद करो। 5. तो फिर मेरा और तुम्हारा जीवन-मरण साथ ही होगा।
B. ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक के लेखक जयशंकर प्रसाद हैं। इस नाटक में ध्रुवस्वामिनी के संवादों का पहले से बाद को क्रम इस प्रकार है– 1. लौट जाओ इस तुच्छ नारी-जीवन के लिए इतने महान उत्सर्ग की आवश्यकता नहीं। 2. अपनी कामना की वस्तु न पाकर यह आत्महत्या जैसा प्रसंग तो नहीं है। 3. चन्द्रे! तुम मुझे दोनों ओर से नष्ट न करो। यहाँ से लौट जाने पर भी क्या मैं गुप्तकुल के अन्त:पुर में रहने पाऊँगी। 4. चन्द्रे! मेरे भाग्य के आकाश में धूमकेतु-सी अपनी गति बंद करो। 5. तो फिर मेरा और तुम्हारा जीवन-मरण साथ ही होगा।

Explanations:

‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक के लेखक जयशंकर प्रसाद हैं। इस नाटक में ध्रुवस्वामिनी के संवादों का पहले से बाद को क्रम इस प्रकार है– 1. लौट जाओ इस तुच्छ नारी-जीवन के लिए इतने महान उत्सर्ग की आवश्यकता नहीं। 2. अपनी कामना की वस्तु न पाकर यह आत्महत्या जैसा प्रसंग तो नहीं है। 3. चन्द्रे! तुम मुझे दोनों ओर से नष्ट न करो। यहाँ से लौट जाने पर भी क्या मैं गुप्तकुल के अन्त:पुर में रहने पाऊँगी। 4. चन्द्रे! मेरे भाग्य के आकाश में धूमकेतु-सी अपनी गति बंद करो। 5. तो फिर मेरा और तुम्हारा जीवन-मरण साथ ही होगा।