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Q: .
  • A. नारायणदास
  • B. गोबरधनदास
  • C. महंत
  • D. राजा
Correct Answer: Option C - ‘‘लोभ पाप को मूल है, लोभ मिटावट मान’ लोभ कभी नहिं कीजिए, या मैं नरक निदान।’’ ‘अंधेर नगरी’ नाटक में उपर्युक्त कथन ‘महंत’ का है। अंधेर नगरी नाटक का प्रकाशन 1881 ई. में भारतेन्दु ने किया था। नाटक में मूर्ख राजा के शासन में फैले अन्याय, भ्रष्टाचार और व्यवस्था पर कटाक्ष किया गया है। यह ‘छह’ अंकों में रचित नाटक है। भारतेन्दु के प्रमुख नाटक-वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति (1873 ई.), प्रेम जोगनी (1875 ई.), चन्द्रावली (1876 ई.), भारत दुर्दशा (1880 ई.), नील देवी (1881 ई.), अंधेर नगरी (1881 ई.), सती प्रताप (1883 ई.)।
C. ‘‘लोभ पाप को मूल है, लोभ मिटावट मान’ लोभ कभी नहिं कीजिए, या मैं नरक निदान।’’ ‘अंधेर नगरी’ नाटक में उपर्युक्त कथन ‘महंत’ का है। अंधेर नगरी नाटक का प्रकाशन 1881 ई. में भारतेन्दु ने किया था। नाटक में मूर्ख राजा के शासन में फैले अन्याय, भ्रष्टाचार और व्यवस्था पर कटाक्ष किया गया है। यह ‘छह’ अंकों में रचित नाटक है। भारतेन्दु के प्रमुख नाटक-वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति (1873 ई.), प्रेम जोगनी (1875 ई.), चन्द्रावली (1876 ई.), भारत दुर्दशा (1880 ई.), नील देवी (1881 ई.), अंधेर नगरी (1881 ई.), सती प्रताप (1883 ई.)।

Explanations:

‘‘लोभ पाप को मूल है, लोभ मिटावट मान’ लोभ कभी नहिं कीजिए, या मैं नरक निदान।’’ ‘अंधेर नगरी’ नाटक में उपर्युक्त कथन ‘महंत’ का है। अंधेर नगरी नाटक का प्रकाशन 1881 ई. में भारतेन्दु ने किया था। नाटक में मूर्ख राजा के शासन में फैले अन्याय, भ्रष्टाचार और व्यवस्था पर कटाक्ष किया गया है। यह ‘छह’ अंकों में रचित नाटक है। भारतेन्दु के प्रमुख नाटक-वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति (1873 ई.), प्रेम जोगनी (1875 ई.), चन्द्रावली (1876 ई.), भारत दुर्दशा (1880 ई.), नील देवी (1881 ई.), अंधेर नगरी (1881 ई.), सती प्रताप (1883 ई.)।