Correct Answer:
Option B - ‘मानव कब दानव से भी दुद्र्दंत, पशु से भी बर्बर और पत्थर से भी कठोर, करुणा के लिए निरवकाश हृदय वाला हो जाएगा, नहीं जाना जा सकता।’ चन्द्रगुप्त नाटक का उक्त संवाद सिंहरण का है। ‘चन्द्रगुप्त’ (1931 ई.) नाटक के लेखक जयशंकर प्रसाद हैं। प्रसाद जी के मन में भारत की गुलामी को लेकर गहरी व्यथा थी। इस ऐतिहासिक प्रसंग के माध्यम से उन्होंने अपने इस विश्वास को वाणी दी। इस नाटक के प्रमुख पात्र हैं– चाणक्य, चन्द्रगुप्त, सिंहरण, पवर्तेश्वर, राक्षस, अलका, कार्नेलिया, कल्याणी, मालविका, सुवासिनी आदि।
B. ‘मानव कब दानव से भी दुद्र्दंत, पशु से भी बर्बर और पत्थर से भी कठोर, करुणा के लिए निरवकाश हृदय वाला हो जाएगा, नहीं जाना जा सकता।’ चन्द्रगुप्त नाटक का उक्त संवाद सिंहरण का है। ‘चन्द्रगुप्त’ (1931 ई.) नाटक के लेखक जयशंकर प्रसाद हैं। प्रसाद जी के मन में भारत की गुलामी को लेकर गहरी व्यथा थी। इस ऐतिहासिक प्रसंग के माध्यम से उन्होंने अपने इस विश्वास को वाणी दी। इस नाटक के प्रमुख पात्र हैं– चाणक्य, चन्द्रगुप्त, सिंहरण, पवर्तेश्वर, राक्षस, अलका, कार्नेलिया, कल्याणी, मालविका, सुवासिनी आदि।