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  • A. अगूढ़ व्यंग्य
  • B. अपरांग व्यंग्य
  • C. संदिग्ध प्राधान्य व्यंग्य
  • D. तुल्य प्राधान्य व्यंग्य
Correct Answer: Option A - उपर्युक्त पंक्तियों में ‘गुणीभूत व्यंग्य’ का अगूढ़व्यंग्य भेद पाया जाता है। ⇒ अगूढ़ व्यंग्य:- जो व्यंग्य वाच्यार्थ के समान स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है वह अगूढ़ व्यंग्य कहलाता है। जैसे- पुत्रवती युवती जग सोई। रघुवर भगत जासु सुत होई। ⇒ गुणीभूत व्यंग्य वाच्य की अपेक्षा गौण व्यंग्य को गुणीभूत व्यंग्य कहते है। गुणीभूत का अर्थ है अप्रधान बन जाना अर्थात वात्यार्थ से अधिक चमत्कार न होना। अभिप्राय यह कि जहाँ व्यांग्यार्थ वाच्यार्थ से उत्तम न हो वहाँ गुर्णीभूत व्यंग्य होता है। इसके आठ भेद है- अगूढ़ व्यंग्य, अपरांग व्यंग्य, वाच्य सिद्धान्त व्यंग्य, अस्फुट व्यंग्य, संदिग्ध प्राधान्य व्यंग्य, तुल्य प्राधान्य व्यंग्म, काकाक्षित व्यंग्य असुन्दर व्यंग्य।
A. उपर्युक्त पंक्तियों में ‘गुणीभूत व्यंग्य’ का अगूढ़व्यंग्य भेद पाया जाता है। ⇒ अगूढ़ व्यंग्य:- जो व्यंग्य वाच्यार्थ के समान स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है वह अगूढ़ व्यंग्य कहलाता है। जैसे- पुत्रवती युवती जग सोई। रघुवर भगत जासु सुत होई। ⇒ गुणीभूत व्यंग्य वाच्य की अपेक्षा गौण व्यंग्य को गुणीभूत व्यंग्य कहते है। गुणीभूत का अर्थ है अप्रधान बन जाना अर्थात वात्यार्थ से अधिक चमत्कार न होना। अभिप्राय यह कि जहाँ व्यांग्यार्थ वाच्यार्थ से उत्तम न हो वहाँ गुर्णीभूत व्यंग्य होता है। इसके आठ भेद है- अगूढ़ व्यंग्य, अपरांग व्यंग्य, वाच्य सिद्धान्त व्यंग्य, अस्फुट व्यंग्य, संदिग्ध प्राधान्य व्यंग्य, तुल्य प्राधान्य व्यंग्म, काकाक्षित व्यंग्य असुन्दर व्यंग्य।

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उपर्युक्त पंक्तियों में ‘गुणीभूत व्यंग्य’ का अगूढ़व्यंग्य भेद पाया जाता है। ⇒ अगूढ़ व्यंग्य:- जो व्यंग्य वाच्यार्थ के समान स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है वह अगूढ़ व्यंग्य कहलाता है। जैसे- पुत्रवती युवती जग सोई। रघुवर भगत जासु सुत होई। ⇒ गुणीभूत व्यंग्य वाच्य की अपेक्षा गौण व्यंग्य को गुणीभूत व्यंग्य कहते है। गुणीभूत का अर्थ है अप्रधान बन जाना अर्थात वात्यार्थ से अधिक चमत्कार न होना। अभिप्राय यह कि जहाँ व्यांग्यार्थ वाच्यार्थ से उत्तम न हो वहाँ गुर्णीभूत व्यंग्य होता है। इसके आठ भेद है- अगूढ़ व्यंग्य, अपरांग व्यंग्य, वाच्य सिद्धान्त व्यंग्य, अस्फुट व्यंग्य, संदिग्ध प्राधान्य व्यंग्य, तुल्य प्राधान्य व्यंग्म, काकाक्षित व्यंग्य असुन्दर व्यंग्य।