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Q: .
  • A. तीन
  • B. चार
  • C. पाँच
  • D. दो
Correct Answer: Option B - हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा चार खंडों में लिखी है- हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा:- भाग-1: क्या भूलूँ क्या याद करूँ (1969) भाग-2: नीड़ का निर्माण फिर (1970) भाग-3: बसेरे से दूर (1978) भाग-4: दशद्वार से सोपान तक (1985) ⇒ चार खण्डों में प्रकाशित बच्चन जी की आत्मकथा स्वयं उन्ही के शब्दों में एक ‘स्मृति-यात्रा-यज्ञ’ है। इस स्मृति यज्ञ में प्रकारान्तर से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का हिन्दी-भाषा और साहित्य का पूरा संघर्ष ही मूर्त हो गया है। इस आत्मकथा में संस्मरण, यात्रावृत्त, कविता, साक्षात्कार, नैरेशन आदि अनेक विधाएँ और शैलियाँ गुंफित है। सबसे बड़ी बात है- लेखक के आत्म-स्वीकार का साहस। धर्मवीर भारती ने ठीक ही कहा है- ‘‘हिन्दी में अपने बारे में सब कुछ इतनी बेबाकी, साहस और सद्भावना से कह देना- यह पहली बार हुआ है।
B. हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा चार खंडों में लिखी है- हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा:- भाग-1: क्या भूलूँ क्या याद करूँ (1969) भाग-2: नीड़ का निर्माण फिर (1970) भाग-3: बसेरे से दूर (1978) भाग-4: दशद्वार से सोपान तक (1985) ⇒ चार खण्डों में प्रकाशित बच्चन जी की आत्मकथा स्वयं उन्ही के शब्दों में एक ‘स्मृति-यात्रा-यज्ञ’ है। इस स्मृति यज्ञ में प्रकारान्तर से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का हिन्दी-भाषा और साहित्य का पूरा संघर्ष ही मूर्त हो गया है। इस आत्मकथा में संस्मरण, यात्रावृत्त, कविता, साक्षात्कार, नैरेशन आदि अनेक विधाएँ और शैलियाँ गुंफित है। सबसे बड़ी बात है- लेखक के आत्म-स्वीकार का साहस। धर्मवीर भारती ने ठीक ही कहा है- ‘‘हिन्दी में अपने बारे में सब कुछ इतनी बेबाकी, साहस और सद्भावना से कह देना- यह पहली बार हुआ है।

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हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा चार खंडों में लिखी है- हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा:- भाग-1: क्या भूलूँ क्या याद करूँ (1969) भाग-2: नीड़ का निर्माण फिर (1970) भाग-3: बसेरे से दूर (1978) भाग-4: दशद्वार से सोपान तक (1985) ⇒ चार खण्डों में प्रकाशित बच्चन जी की आत्मकथा स्वयं उन्ही के शब्दों में एक ‘स्मृति-यात्रा-यज्ञ’ है। इस स्मृति यज्ञ में प्रकारान्तर से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का हिन्दी-भाषा और साहित्य का पूरा संघर्ष ही मूर्त हो गया है। इस आत्मकथा में संस्मरण, यात्रावृत्त, कविता, साक्षात्कार, नैरेशन आदि अनेक विधाएँ और शैलियाँ गुंफित है। सबसे बड़ी बात है- लेखक के आत्म-स्वीकार का साहस। धर्मवीर भारती ने ठीक ही कहा है- ‘‘हिन्दी में अपने बारे में सब कुछ इतनी बेबाकी, साहस और सद्भावना से कह देना- यह पहली बार हुआ है।