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  • A. 1 3 2 4
  • B. 2 3 1 4
  • C. 2 3 4 1
  • D. उपर्युक्त में से एक से अधिक
  • E. उपर्युक्त में से कोई नहीं
Correct Answer: Option C - रचनाओं और उनके काल का सही सुमेलन है। रचना काल पृथ्वीराज रासो आदिकाल पद्मावत भक्तिकाल विहारी सतसई रीतिकाल भारत-भारती आधुनिक काल ⇒ पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई कृत 12वीं शती में पिंगल शैली में लिखा एक प्रबन्ध काव्य है। जो 69 समय (सर्ग) और 68 प्रकार के दंदों का प्रयोग हुआ है। इसमें पृथ्वीराज चौहान के शौर्य और वीरता के अलावा, संयोगिता के साथ उनकी प्रेम कहानी का भी सुन्दर वर्णन किया है। ⇒ मिश्र बन्धुओं ने लिखा है ‘‘हिन्दी का वास्तविक प्रथम महाकवि चंदबरदाई को ही कहा जा सकता है।’’ ⇒ शुक्ला जी के अनुसार- ‘‘ये (चंदबरदाई) हिन्दी के प्रथम महाकवि माने जाते है और इनका ‘पृथ्वीराज रासो’ हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है।’’ ⇒ पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता को लेकर विद्वान इस प्रकार विभाजित है- प्रामाणिक अर्द्ध प्रमाणिक अप्रामाणिक मिश्र बन्धु मुनिजिन विजय डॉ. बूलर श्याम सुन्दर दास ह.प्र. द्विवेदी रामचन्द्र शुक्ल मोहनलाल डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी मुंशी देवी प्रसाद विष्णु लाल पंड्या डॉ. दशरथ ओझा कविराज श्यामलदास कर्नल टाड गौरीशंकर हीराचंद ओझा ⇒ सर्वप्रथम डॉ. बूलर ने 1875 में जयानक कृत ‘पृथ्वीराज विजय’ (संस्कृत) के आधार पर ‘पृथ्वीराज रासो’ का अप्रामाणिक घोषित किया। ⇒ ह.प्र. द्विवेदी के अनुसार ‘‘इसकी रचना शुक-शुकी संवाद के रूप में हुई है। ⇒ पद्मावत, जायसी कृत 1540 ई. में अवधी तथा दोहा-चौपाई में लिया गया है। इसे अवधी का महाकाव्य भाग जाता है। इसमें 57 खण्ड है। उत्प्रेक्षा अलंकार की प्रधानता है। ⇒ शुक्ल जी के अनुसार ‘पद्मावत’ की कथा की पूर्वार्द्ध ‘कल्पित’ और उत्त्रार्ध ‘ऐतिहासिक’ है। ⇒ ‘पद्मावत’ में नागमती, पद्मावती और रत्नसेन की प्रेम कहानी है। ⇒ विजय देव नारायण साही ने ‘पद्मावत’ को हिन्दी में अपने ढंग की अकेली ट्रेजिक कृति कहा है।’ ⇒ बिहारी लाल की एकमात्र रचना ‘बिहारी सतसई’ दोहा छंद में रचित है। इसकी भाषा परिनिष्ठित साहित्यिक ब्रजभाषा है। बिहारीलाल के समस्त दोहों की संख्या 719 है। किन्तु जगन्नाथदास रत्नाकर ने इनके दोहों की संख्या 713 माना है। ⇒ डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन के अनुसार ‘यूरोप में बिहारी सतसई’ के समकक्ष कोई रचना नहीं है। ⇒ ‘बिहारी सतसई’ पर हिन्दी में 50 से अधिक टीका प्राप्त है। बिहारी लाल के पुत्र कृष्णलाल कवि ने बिहारी सतसई की टीका सर्वप्रथम सवैया छन्द में ब्रज भाषा में लिखी। ⇒ मैथिलीशरण गुप्त ने भारत-भारती की रचना 1912 ई. में की। गुप्त जी को ‘भारत-भारती’ रचना की मूल प्रेरणा ‘मुसद्द से हाली’ तथा ब्रजमोहन दत्ताश्रेय कैफी कृत ‘भारत दर्पण’ पुस्तक से प्राप्त हुई है। ⇒ गुप्तजी को ‘भारत-भारती’ लिखने पर महात्मा गाँधी ने राष्ट्रकवि की उपाधि दी।
C. रचनाओं और उनके काल का सही सुमेलन है। रचना काल पृथ्वीराज रासो आदिकाल पद्मावत भक्तिकाल विहारी सतसई रीतिकाल भारत-भारती आधुनिक काल ⇒ पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई कृत 12वीं शती में पिंगल शैली में लिखा एक प्रबन्ध काव्य है। जो 69 समय (सर्ग) और 68 प्रकार के दंदों का प्रयोग हुआ है। इसमें पृथ्वीराज चौहान के शौर्य और वीरता के अलावा, संयोगिता के साथ उनकी प्रेम कहानी का भी सुन्दर वर्णन किया है। ⇒ मिश्र बन्धुओं ने लिखा है ‘‘हिन्दी का वास्तविक प्रथम महाकवि चंदबरदाई को ही कहा जा सकता है।’’ ⇒ शुक्ला जी के अनुसार- ‘‘ये (चंदबरदाई) हिन्दी के प्रथम महाकवि माने जाते है और इनका ‘पृथ्वीराज रासो’ हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है।’’ ⇒ पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता को लेकर विद्वान इस प्रकार विभाजित है- प्रामाणिक अर्द्ध प्रमाणिक अप्रामाणिक मिश्र बन्धु मुनिजिन विजय डॉ. बूलर श्याम सुन्दर दास ह.प्र. द्विवेदी रामचन्द्र शुक्ल मोहनलाल डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी मुंशी देवी प्रसाद विष्णु लाल पंड्या डॉ. दशरथ ओझा कविराज श्यामलदास कर्नल टाड गौरीशंकर हीराचंद ओझा ⇒ सर्वप्रथम डॉ. बूलर ने 1875 में जयानक कृत ‘पृथ्वीराज विजय’ (संस्कृत) के आधार पर ‘पृथ्वीराज रासो’ का अप्रामाणिक घोषित किया। ⇒ ह.प्र. द्विवेदी के अनुसार ‘‘इसकी रचना शुक-शुकी संवाद के रूप में हुई है। ⇒ पद्मावत, जायसी कृत 1540 ई. में अवधी तथा दोहा-चौपाई में लिया गया है। इसे अवधी का महाकाव्य भाग जाता है। इसमें 57 खण्ड है। उत्प्रेक्षा अलंकार की प्रधानता है। ⇒ शुक्ल जी के अनुसार ‘पद्मावत’ की कथा की पूर्वार्द्ध ‘कल्पित’ और उत्त्रार्ध ‘ऐतिहासिक’ है। ⇒ ‘पद्मावत’ में नागमती, पद्मावती और रत्नसेन की प्रेम कहानी है। ⇒ विजय देव नारायण साही ने ‘पद्मावत’ को हिन्दी में अपने ढंग की अकेली ट्रेजिक कृति कहा है।’ ⇒ बिहारी लाल की एकमात्र रचना ‘बिहारी सतसई’ दोहा छंद में रचित है। इसकी भाषा परिनिष्ठित साहित्यिक ब्रजभाषा है। बिहारीलाल के समस्त दोहों की संख्या 719 है। किन्तु जगन्नाथदास रत्नाकर ने इनके दोहों की संख्या 713 माना है। ⇒ डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन के अनुसार ‘यूरोप में बिहारी सतसई’ के समकक्ष कोई रचना नहीं है। ⇒ ‘बिहारी सतसई’ पर हिन्दी में 50 से अधिक टीका प्राप्त है। बिहारी लाल के पुत्र कृष्णलाल कवि ने बिहारी सतसई की टीका सर्वप्रथम सवैया छन्द में ब्रज भाषा में लिखी। ⇒ मैथिलीशरण गुप्त ने भारत-भारती की रचना 1912 ई. में की। गुप्त जी को ‘भारत-भारती’ रचना की मूल प्रेरणा ‘मुसद्द से हाली’ तथा ब्रजमोहन दत्ताश्रेय कैफी कृत ‘भारत दर्पण’ पुस्तक से प्राप्त हुई है। ⇒ गुप्तजी को ‘भारत-भारती’ लिखने पर महात्मा गाँधी ने राष्ट्रकवि की उपाधि दी।

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रचनाओं और उनके काल का सही सुमेलन है। रचना काल पृथ्वीराज रासो आदिकाल पद्मावत भक्तिकाल विहारी सतसई रीतिकाल भारत-भारती आधुनिक काल ⇒ पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई कृत 12वीं शती में पिंगल शैली में लिखा एक प्रबन्ध काव्य है। जो 69 समय (सर्ग) और 68 प्रकार के दंदों का प्रयोग हुआ है। इसमें पृथ्वीराज चौहान के शौर्य और वीरता के अलावा, संयोगिता के साथ उनकी प्रेम कहानी का भी सुन्दर वर्णन किया है। ⇒ मिश्र बन्धुओं ने लिखा है ‘‘हिन्दी का वास्तविक प्रथम महाकवि चंदबरदाई को ही कहा जा सकता है।’’ ⇒ शुक्ला जी के अनुसार- ‘‘ये (चंदबरदाई) हिन्दी के प्रथम महाकवि माने जाते है और इनका ‘पृथ्वीराज रासो’ हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है।’’ ⇒ पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता को लेकर विद्वान इस प्रकार विभाजित है- प्रामाणिक अर्द्ध प्रमाणिक अप्रामाणिक मिश्र बन्धु मुनिजिन विजय डॉ. बूलर श्याम सुन्दर दास ह.प्र. द्विवेदी रामचन्द्र शुक्ल मोहनलाल डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी मुंशी देवी प्रसाद विष्णु लाल पंड्या डॉ. दशरथ ओझा कविराज श्यामलदास कर्नल टाड गौरीशंकर हीराचंद ओझा ⇒ सर्वप्रथम डॉ. बूलर ने 1875 में जयानक कृत ‘पृथ्वीराज विजय’ (संस्कृत) के आधार पर ‘पृथ्वीराज रासो’ का अप्रामाणिक घोषित किया। ⇒ ह.प्र. द्विवेदी के अनुसार ‘‘इसकी रचना शुक-शुकी संवाद के रूप में हुई है। ⇒ पद्मावत, जायसी कृत 1540 ई. में अवधी तथा दोहा-चौपाई में लिया गया है। इसे अवधी का महाकाव्य भाग जाता है। इसमें 57 खण्ड है। उत्प्रेक्षा अलंकार की प्रधानता है। ⇒ शुक्ल जी के अनुसार ‘पद्मावत’ की कथा की पूर्वार्द्ध ‘कल्पित’ और उत्त्रार्ध ‘ऐतिहासिक’ है। ⇒ ‘पद्मावत’ में नागमती, पद्मावती और रत्नसेन की प्रेम कहानी है। ⇒ विजय देव नारायण साही ने ‘पद्मावत’ को हिन्दी में अपने ढंग की अकेली ट्रेजिक कृति कहा है।’ ⇒ बिहारी लाल की एकमात्र रचना ‘बिहारी सतसई’ दोहा छंद में रचित है। इसकी भाषा परिनिष्ठित साहित्यिक ब्रजभाषा है। बिहारीलाल के समस्त दोहों की संख्या 719 है। किन्तु जगन्नाथदास रत्नाकर ने इनके दोहों की संख्या 713 माना है। ⇒ डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन के अनुसार ‘यूरोप में बिहारी सतसई’ के समकक्ष कोई रचना नहीं है। ⇒ ‘बिहारी सतसई’ पर हिन्दी में 50 से अधिक टीका प्राप्त है। बिहारी लाल के पुत्र कृष्णलाल कवि ने बिहारी सतसई की टीका सर्वप्रथम सवैया छन्द में ब्रज भाषा में लिखी। ⇒ मैथिलीशरण गुप्त ने भारत-भारती की रचना 1912 ई. में की। गुप्त जी को ‘भारत-भारती’ रचना की मूल प्रेरणा ‘मुसद्द से हाली’ तथा ब्रजमोहन दत्ताश्रेय कैफी कृत ‘भारत दर्पण’ पुस्तक से प्राप्त हुई है। ⇒ गुप्तजी को ‘भारत-भारती’ लिखने पर महात्मा गाँधी ने राष्ट्रकवि की उपाधि दी।