Correct Answer:
Option C - यक्ष: रामगिर्याश्रमेषु ‘वसतिम्’ चक्रे।
कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत्त:
शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्ष भोग्येण भर्तु:।
यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नान पुण्योदकेषु,
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।
अर्थात् अपने कार्य से असावधान, प्रिया के विरह से दु:खी, एक वर्ष तक भोगने वाले, स्वामी के शाप से नष्ट महिमा वाला, कोई यक्ष जनक की पुत्री के स्नान से पवित्र जल वाले, घने छाया वाले वृक्षों से युक्त, रामगिरि के आश्रमों में निवास करता था।
C. यक्ष: रामगिर्याश्रमेषु ‘वसतिम्’ चक्रे।
कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत्त:
शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्ष भोग्येण भर्तु:।
यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नान पुण्योदकेषु,
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।
अर्थात् अपने कार्य से असावधान, प्रिया के विरह से दु:खी, एक वर्ष तक भोगने वाले, स्वामी के शाप से नष्ट महिमा वाला, कोई यक्ष जनक की पुत्री के स्नान से पवित्र जल वाले, घने छाया वाले वृक्षों से युक्त, रामगिरि के आश्रमों में निवास करता था।