Correct Answer:
Option D - ‘यह प्रेम को पंथ कराल महा तरवारि की धार पै धावनो है।’ यह काव्य पंक्ति बोधा की है।
रीतिकालीन रीतिमुक्त कवि की काव्य पंक्तियाँ निम्नवत् है–
– ‘‘यों घन आनन्द छावत भावत, जान सजीवन ओर ते आवत।
लोग हैं लागि कवित्त बनावत, मोहि तो मेरे कवित्त बनावत।।
– घनानन्द की
– ‘‘प्रेम रंग-पगे जगमगे जग जामिनी के।
जोबन की जोति जगी जोर उमगत है।।’’
– आलम की
– ‘‘सेवक सिपाही हम उन राजपूतन को।
दान जुद्ध जुरिबे में नेकु जे न मुरको।।’’
– ठाकुर का
D. ‘यह प्रेम को पंथ कराल महा तरवारि की धार पै धावनो है।’ यह काव्य पंक्ति बोधा की है।
रीतिकालीन रीतिमुक्त कवि की काव्य पंक्तियाँ निम्नवत् है–
– ‘‘यों घन आनन्द छावत भावत, जान सजीवन ओर ते आवत।
लोग हैं लागि कवित्त बनावत, मोहि तो मेरे कवित्त बनावत।।
– घनानन्द की
– ‘‘प्रेम रंग-पगे जगमगे जग जामिनी के।
जोबन की जोति जगी जोर उमगत है।।’’
– आलम की
– ‘‘सेवक सिपाही हम उन राजपूतन को।
दान जुद्ध जुरिबे में नेकु जे न मुरको।।’’
– ठाकुर का