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Q: Who among the following decided to launch the Independent Party on 16 December, 1922? निम्नलिखित में से किन लोगों ने 16 दिसम्बर, 1922 को इंडिपेन्डेन्ट पार्टी बनाने का निर्णय लिया था? Select the correct answer from the codes given below:/ नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए- 1. Lala Har Dayal/लाला हरदयाल 2. Madan Mohan Malviya/मदन मोहन मालवीय 3. Mohammed Ali Jinnah/मोहम्मद अली जिन्ना 4. Motilal Nehru/मोतीलाल नेहरू Codes/कूट :
  • A. 1 and 2/1 तथा 2
  • B. 2 and 3/2 तथा 3
  • C. 3 and 4/3 तथा 4
  • D. 2 and 4/2 तथा 4
Correct Answer: Option D - 16 दिसम्बर, 1922 को इंडिपेंडेन्ट पार्टी बनाने का निर्णय मदन मोहन मालवीय और मोतीलाल नेहरू ने लिया था। मोतीलाल नेहरू ने सी.आर. दास के साथ मिलकर 1 जनवरी, 1923 में स्वराज पार्टी का गठन किया था। गाँधीजी विधान परिषदों का सदस्य बनने एवं उसकी कार्यवाही में बाधा पहुँचाने की नीति के विरोधी थे। यद्यपि गाँधीजी स्वराजी नेताओं की नीतियों के विरोधी थे, पर उनकी ईमानदारी एवं निष्ठा पर उन्हें शक नहीं था। उन्होंने स्वराजवादी नेताओं को ‘सुयोग्य, अनुभवी एवं ईमानदार देशभक्त’ की संज्ञा दी थी। इससे स्वराजियों के प्रति गाँधीजी की मनोवृत्ति का पता चलता है।
D. 16 दिसम्बर, 1922 को इंडिपेंडेन्ट पार्टी बनाने का निर्णय मदन मोहन मालवीय और मोतीलाल नेहरू ने लिया था। मोतीलाल नेहरू ने सी.आर. दास के साथ मिलकर 1 जनवरी, 1923 में स्वराज पार्टी का गठन किया था। गाँधीजी विधान परिषदों का सदस्य बनने एवं उसकी कार्यवाही में बाधा पहुँचाने की नीति के विरोधी थे। यद्यपि गाँधीजी स्वराजी नेताओं की नीतियों के विरोधी थे, पर उनकी ईमानदारी एवं निष्ठा पर उन्हें शक नहीं था। उन्होंने स्वराजवादी नेताओं को ‘सुयोग्य, अनुभवी एवं ईमानदार देशभक्त’ की संज्ञा दी थी। इससे स्वराजियों के प्रति गाँधीजी की मनोवृत्ति का पता चलता है।

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16 दिसम्बर, 1922 को इंडिपेंडेन्ट पार्टी बनाने का निर्णय मदन मोहन मालवीय और मोतीलाल नेहरू ने लिया था। मोतीलाल नेहरू ने सी.आर. दास के साथ मिलकर 1 जनवरी, 1923 में स्वराज पार्टी का गठन किया था। गाँधीजी विधान परिषदों का सदस्य बनने एवं उसकी कार्यवाही में बाधा पहुँचाने की नीति के विरोधी थे। यद्यपि गाँधीजी स्वराजी नेताओं की नीतियों के विरोधी थे, पर उनकी ईमानदारी एवं निष्ठा पर उन्हें शक नहीं था। उन्होंने स्वराजवादी नेताओं को ‘सुयोग्य, अनुभवी एवं ईमानदार देशभक्त’ की संज्ञा दी थी। इससे स्वराजियों के प्रति गाँधीजी की मनोवृत्ति का पता चलता है।