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Q: Which of the following soils of India has been formed due to weathering of basaltic lava? भारत की निम्न मिट्टियों में से कौन बेसाल्ट लावा के अपक्षय के कारण निर्मित हुई है?
  • A. Alluvial soils/जलोढ़ मिट्टियाँ
  • B. Laterite soils/लैटेराइट मिट्टियाँ
  • C. Red soils/लाल मिट्टियाँ
  • D. Regur soils/रेगुर मिट्टियाँ
Correct Answer: Option D - रेगुर मिट्टी (काली मिट्टी) का निर्माण बेसाल्ट चट्टानों के टूटने-फूटने से होता है। इसमें आयरन, चूना, एल्यूमीनियम एवं मैग्नीशियम की बहुलता होती है। इस मिट्टी का काला रंग (इसे रेगुर मिट्टी के नाम से भी जाना जाता है) टिटेनीफेरेस मैग्नेटाइट एवं जीवाश्म की उपस्थिति के कारण होता है। इस मिट्टी में शुष्कता होने पर स्वत: विघटन की प्रक्रिया पायी जाती है। अत: यह स्वत: जुताई वाली मृदा कहलाती है। उसमें पानी अवशोषण की क्षमता उच्च होती है इसलिए यह दलदली भी हो जाती है। इस मृदा में गन्ना एवं कपास की खेती उत्तम होती है। भारत के मालवा के पठार, दक्कन के क्षेत्रों में एवं महाराष्ट्र में पायी जाती है।
D. रेगुर मिट्टी (काली मिट्टी) का निर्माण बेसाल्ट चट्टानों के टूटने-फूटने से होता है। इसमें आयरन, चूना, एल्यूमीनियम एवं मैग्नीशियम की बहुलता होती है। इस मिट्टी का काला रंग (इसे रेगुर मिट्टी के नाम से भी जाना जाता है) टिटेनीफेरेस मैग्नेटाइट एवं जीवाश्म की उपस्थिति के कारण होता है। इस मिट्टी में शुष्कता होने पर स्वत: विघटन की प्रक्रिया पायी जाती है। अत: यह स्वत: जुताई वाली मृदा कहलाती है। उसमें पानी अवशोषण की क्षमता उच्च होती है इसलिए यह दलदली भी हो जाती है। इस मृदा में गन्ना एवं कपास की खेती उत्तम होती है। भारत के मालवा के पठार, दक्कन के क्षेत्रों में एवं महाराष्ट्र में पायी जाती है।

Explanations:

रेगुर मिट्टी (काली मिट्टी) का निर्माण बेसाल्ट चट्टानों के टूटने-फूटने से होता है। इसमें आयरन, चूना, एल्यूमीनियम एवं मैग्नीशियम की बहुलता होती है। इस मिट्टी का काला रंग (इसे रेगुर मिट्टी के नाम से भी जाना जाता है) टिटेनीफेरेस मैग्नेटाइट एवं जीवाश्म की उपस्थिति के कारण होता है। इस मिट्टी में शुष्कता होने पर स्वत: विघटन की प्रक्रिया पायी जाती है। अत: यह स्वत: जुताई वाली मृदा कहलाती है। उसमें पानी अवशोषण की क्षमता उच्च होती है इसलिए यह दलदली भी हो जाती है। इस मृदा में गन्ना एवं कपास की खेती उत्तम होती है। भारत के मालवा के पठार, दक्कन के क्षेत्रों में एवं महाराष्ट्र में पायी जाती है।