Correct Answer:
Option A - जीन पियाजे, स्विट्जरलैंड के एक मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने बालक के सम्पूर्ण विकास को अपने सिद्धान्त में बताया था। ‘‘बालकों की वृद्धि और विकास किस तरह से होता है’’ इस विषय के अध्ययन में उनकी विशेष रूचि थी जिसके लिए उन्होंने स्वयं के बच्चों को अपनी खोज का आधार बनाया। बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते गये, उनकी मानसिक विकास संबंधी क्रियाओं का वे बड़ी बारीकी से अध्ययन करते रहे। इस अध्ययन के परिणामस्वरूप उन्होंने जिन विचारों का प्रतिपादन किया उन्हें पियाजे के मानसिक या संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। जीन पियाजे ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन 1952 में किया। इसमें उन्होंने विकास की चार अवस्थाएँ बताई थी। अब प्रश्नानुसार यदि देखा जाए तो विकल्प (a) पियाजे के विकास की अवस्था के अन्तर्गत गलत है। औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था में बच्चा पूर्ण परिपक्व हो जाता है। यह अवस्था 11-12 वर्ष से प्रारम्भ होकर वयस्क अवस्था के प्रारम्भ तक मानी जाती है। इस अवस्था में बच्चे प्रतीकात्मक शब्दों का अर्थ भी समझने लगते हैं। विचार करने, तर्क करने, कल्पना करने, निरीक्षण, परीक्षण, प्रयोग द्वारा उचित निष्कर्ष निकालने की क्षमता का विकास हो जाता है। संश्लेषण, विश्लेषण, नियमीकरण तथा सूक्ष्म सिद्धान्तों की स्थापना सम्बन्धी उच्च मानसिक क्षमताओं का समुचित विकास हो जाता है।
A. जीन पियाजे, स्विट्जरलैंड के एक मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने बालक के सम्पूर्ण विकास को अपने सिद्धान्त में बताया था। ‘‘बालकों की वृद्धि और विकास किस तरह से होता है’’ इस विषय के अध्ययन में उनकी विशेष रूचि थी जिसके लिए उन्होंने स्वयं के बच्चों को अपनी खोज का आधार बनाया। बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते गये, उनकी मानसिक विकास संबंधी क्रियाओं का वे बड़ी बारीकी से अध्ययन करते रहे। इस अध्ययन के परिणामस्वरूप उन्होंने जिन विचारों का प्रतिपादन किया उन्हें पियाजे के मानसिक या संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। जीन पियाजे ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन 1952 में किया। इसमें उन्होंने विकास की चार अवस्थाएँ बताई थी। अब प्रश्नानुसार यदि देखा जाए तो विकल्प (a) पियाजे के विकास की अवस्था के अन्तर्गत गलत है। औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था में बच्चा पूर्ण परिपक्व हो जाता है। यह अवस्था 11-12 वर्ष से प्रारम्भ होकर वयस्क अवस्था के प्रारम्भ तक मानी जाती है। इस अवस्था में बच्चे प्रतीकात्मक शब्दों का अर्थ भी समझने लगते हैं। विचार करने, तर्क करने, कल्पना करने, निरीक्षण, परीक्षण, प्रयोग द्वारा उचित निष्कर्ष निकालने की क्षमता का विकास हो जाता है। संश्लेषण, विश्लेषण, नियमीकरण तथा सूक्ष्म सिद्धान्तों की स्थापना सम्बन्धी उच्च मानसिक क्षमताओं का समुचित विकास हो जाता है।