Correct Answer:
Option A - उत्तर वैदिक काल के दौरान रचित प्राचीन भारतीय ग्रंथ उपनिषद् में दार्शनिक भजन और ब्रह्माण्ड विज्ञान और नैतिकता पर चर्चाएँ शामिल हैं। अधिकांश चिंतकों का यह मानना था कि इस विश्व में कुछ तो ऐसा है जो कि स्थायी है और जो मृत्यु के बाद भी बचा रहता है। उन्होनें इसका वर्णन आत्मा तथा ब्रह्म अथवा सर्वभौम आत्मा के रुप में किया है। वे मानते थे कि अंतत: आत्मा तथा ब्रह्म एक ही है। ऐसे कई विचारों का संकलन उपनिषदों में हुआ है। उपनिषद् उत्तर वैदिक ग्रंथों का हिस्सा थे। उपनिषद् का शाब्दिक अर्थ है गुरु के समीप बैठकर अपने अज्ञानरुपी अंधकार को दूर करते हुए ब्रह्मविद्या रुपी प्रकाश को प्राप्त करना। वेदों के दार्शनिक तत्व उपनिषद् में सार रुप में प्रकट हुए है। समस्त भारतीय दर्शनों का मूल स्त्रोत उपनिषद् है। सामान्यत: इनकी संख्या 108 मानी जाती है।
A. उत्तर वैदिक काल के दौरान रचित प्राचीन भारतीय ग्रंथ उपनिषद् में दार्शनिक भजन और ब्रह्माण्ड विज्ञान और नैतिकता पर चर्चाएँ शामिल हैं। अधिकांश चिंतकों का यह मानना था कि इस विश्व में कुछ तो ऐसा है जो कि स्थायी है और जो मृत्यु के बाद भी बचा रहता है। उन्होनें इसका वर्णन आत्मा तथा ब्रह्म अथवा सर्वभौम आत्मा के रुप में किया है। वे मानते थे कि अंतत: आत्मा तथा ब्रह्म एक ही है। ऐसे कई विचारों का संकलन उपनिषदों में हुआ है। उपनिषद् उत्तर वैदिक ग्रंथों का हिस्सा थे। उपनिषद् का शाब्दिक अर्थ है गुरु के समीप बैठकर अपने अज्ञानरुपी अंधकार को दूर करते हुए ब्रह्मविद्या रुपी प्रकाश को प्राप्त करना। वेदों के दार्शनिक तत्व उपनिषद् में सार रुप में प्रकट हुए है। समस्त भारतीय दर्शनों का मूल स्त्रोत उपनिषद् है। सामान्यत: इनकी संख्या 108 मानी जाती है।