Correct Answer:
Option D - शाका और जौहर प्रथाएँ राजपूतों में प्रचलित थीं। शाका अनुष्ठान पुरुषों और जौहर अनुष्ठान राजपूत महिलाओं द्वारा किया जाता था। जब हार निश्चित हो जाती थी, तो राजपूत पुरुषों को ‘शाका’ (या ‘शक’) नामक एक अनुष्ठान करना होता था, जो कि उनकी अंतिम लड़ाई होती थी, जिससे वे वापस नहीं आ सकते थे। यह जौहर होने के एक दिन बाद किया जाता था, जिसमें योद्धा केसरिया रंग की पगड़ी पहनकर मैदान में उतरते थे, जो भारतीय संस्कृति में बलिदान का प्रतीक है।
D. शाका और जौहर प्रथाएँ राजपूतों में प्रचलित थीं। शाका अनुष्ठान पुरुषों और जौहर अनुष्ठान राजपूत महिलाओं द्वारा किया जाता था। जब हार निश्चित हो जाती थी, तो राजपूत पुरुषों को ‘शाका’ (या ‘शक’) नामक एक अनुष्ठान करना होता था, जो कि उनकी अंतिम लड़ाई होती थी, जिससे वे वापस नहीं आ सकते थे। यह जौहर होने के एक दिन बाद किया जाता था, जिसमें योद्धा केसरिया रंग की पगड़ी पहनकर मैदान में उतरते थे, जो भारतीय संस्कृति में बलिदान का प्रतीक है।