Explanations:
हृदय की दोनों आवाजों के मध्य 0.8 सेकेण्ड का समयांतराल होता है। हृदयी चक्र में विभिन्न कपाटों (valves) के बन्द होने पर रूधिर में कोलाहल होता है जिससे 4 बार ध्वनि उत्पन्न होती है। दाएँ व बाएँ निलयों का आकुंन एक साथ और अलिन्दों के आकुंचन से अधिक तीव्र होता है। इस आकुंचन के प्रारम्भ हो जाने पर पहले अलिन्द-निलयी, अर्थात त्रिवलनी (tricuspid) एवं द्विवलनी (bicuspid) कपाट एक तीव्र ‘‘लव Lubb’’ की ध्वनि उत्पन्न करते हुये बन्द होते हैं। फिर अधिकतम निलयी आकुंचन के दबाव के कारण दोनों धमनी चापों के अर्धचन्द्राकार कपाट खुल जाते है और निलयों का रूधिर इन चापों में पम्प हो जाता है। आकुंचन के समाप्त होने पर ज्योंहीं रूधिर चापों से वापस निलयों में की ओर गिरता है, यह जेबनुमा अर्धचन्द्राकार कपाटों में भरता है जिससे ये कपाट अपेक्षाकृत एक हल्की ‘‘डप dupp’’ की ध्वनि के साथ बन्द हो जाते है। इन्हीं ‘‘लब’’ एवं ‘‘डप’’ की ध्वनियों को स्टेथोस्कोप से सुनकर डाक्टर हृदय स्पन्दन की जांच करता है। तीसरी ध्वनि निलयों के 70 से 75 प्रतिशत भराव के तथा चौथी आलिन्दों के आकुंचन के समय होती है। ये ध्वनियाँ बहुत धीमी होने के कारण प्राय: सुनाई नहीं देती है।