Correct Answer:
Option A - वेदान्तसारे स्थूलशरीरस्य संज्ञा ‘अन्नमयकोश:’ अस्ति।
अर्थात् वेदान्तसार में स्थूल शरीर की संज्ञा अन्नमयकोश है। जिससे पञ्चीकृत चतुर्विध स्थूल शरीरों (जरायुज, अण्डज, उद्भिज और स्वेदज) की समष्टि से उपहित चैतन्य सभी नरों (प्राणियों) का अभिमानी (अधिष्ठाता) होने से ‘वैश्वानर’ और (देव, असुर, मनुष्य आदि) विविध रूपों से विराजमान होने से ‘विराट्’ कहा जाता है। यह समष्टि वैश्वानर या विराट् का स्थूल शरीर ही अन्न का विकार (कार्य) होने तथा कोश (म्यान) की तरह आत्मा का आच्छादक होने से यह अन्नमयकोश है। अत: विकल्प (a) सही है इसी प्रकार शेष अन्य विकल्प इस प्रकार हैं-
(1) प्राणमयकोश- प्राणादि (प्राण, अपान, व्यान, उदान समान) कर्मेन्द्रियों सहित।
(2) मनोमयकोश - मन ज्ञानेन्द्रिय सहित,
(3) विज्ञानमयकोश - बुद्धि ज्ञानेन्द्रिय सहित।
A. वेदान्तसारे स्थूलशरीरस्य संज्ञा ‘अन्नमयकोश:’ अस्ति।
अर्थात् वेदान्तसार में स्थूल शरीर की संज्ञा अन्नमयकोश है। जिससे पञ्चीकृत चतुर्विध स्थूल शरीरों (जरायुज, अण्डज, उद्भिज और स्वेदज) की समष्टि से उपहित चैतन्य सभी नरों (प्राणियों) का अभिमानी (अधिष्ठाता) होने से ‘वैश्वानर’ और (देव, असुर, मनुष्य आदि) विविध रूपों से विराजमान होने से ‘विराट्’ कहा जाता है। यह समष्टि वैश्वानर या विराट् का स्थूल शरीर ही अन्न का विकार (कार्य) होने तथा कोश (म्यान) की तरह आत्मा का आच्छादक होने से यह अन्नमयकोश है। अत: विकल्प (a) सही है इसी प्रकार शेष अन्य विकल्प इस प्रकार हैं-
(1) प्राणमयकोश- प्राणादि (प्राण, अपान, व्यान, उदान समान) कर्मेन्द्रियों सहित।
(2) मनोमयकोश - मन ज्ञानेन्द्रिय सहित,
(3) विज्ञानमयकोश - बुद्धि ज्ञानेन्द्रिय सहित।