Correct Answer:
Option D - वेदान्तमतं ‘प्रत्यक्चैतन्यमात्मेति’ अस्ति।
अर्थात् शून्य-पर्यन्त सभी वस्तुएं चैतन्य के द्वारा प्रकाश्य होने से घटादि के समान जड़ एवं अनित्य हैं श्रुत्याभासों तथा अनुभवाभासों से उत्तरोत्तर बाधित होने से ये शून्य पर्यन्त सभी आत्मा से भिन्न हैं अत: उनको प्रकाशित करने वाला, नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त तथा सत्य स्वभाव वाला प्रत्यक् (सर्वाधिक आन्तरिक) चैतन्य ही आत्म-तत्व है- ऐसा वेदान्त का मत है।
इसी प्रकार ‘मनात्मेति’ मनात्मवादी चार्वाक का मत है इसमें मन संकल्प- विकल्पात्मक होने से अन्योऽन्तर आत्मा ‘मनोमय’ होता है। ‘बुद्धिरात्मेति’ विज्ञानवादी बौद्ध का मत है इसमें बुद्धि (क्षणिक विज्ञान) ही आत्मा है।
‘अज्ञानमात्मेति’ प्रभाकर मीमांसक एवं नैयायिक का मत है इसमें अज्ञान ही आत्मा है। अत: वेदान्त के अतिरिक्त आत्म-विषयक नौ मत हैं।
D. वेदान्तमतं ‘प्रत्यक्चैतन्यमात्मेति’ अस्ति।
अर्थात् शून्य-पर्यन्त सभी वस्तुएं चैतन्य के द्वारा प्रकाश्य होने से घटादि के समान जड़ एवं अनित्य हैं श्रुत्याभासों तथा अनुभवाभासों से उत्तरोत्तर बाधित होने से ये शून्य पर्यन्त सभी आत्मा से भिन्न हैं अत: उनको प्रकाशित करने वाला, नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त तथा सत्य स्वभाव वाला प्रत्यक् (सर्वाधिक आन्तरिक) चैतन्य ही आत्म-तत्व है- ऐसा वेदान्त का मत है।
इसी प्रकार ‘मनात्मेति’ मनात्मवादी चार्वाक का मत है इसमें मन संकल्प- विकल्पात्मक होने से अन्योऽन्तर आत्मा ‘मनोमय’ होता है। ‘बुद्धिरात्मेति’ विज्ञानवादी बौद्ध का मत है इसमें बुद्धि (क्षणिक विज्ञान) ही आत्मा है।
‘अज्ञानमात्मेति’ प्रभाकर मीमांसक एवं नैयायिक का मत है इसमें अज्ञान ही आत्मा है। अत: वेदान्त के अतिरिक्त आत्म-विषयक नौ मत हैं।