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Q: .
  • A. A, B, C, D, E
  • B. E, B, A, C, D
  • C. B, C, D, A, E
  • D. D, E, A, B, C
Correct Answer: Option B - जयशंकर प्रसाद कृत ‘कामायनी’ (1935 ई.) महाकाव्य है। इसमें 15 सर्ग हैं जिनका क्रम निम्नलिखित है– (1) चिन्ता, (2) आशा, (3) श्रद्धा, (4) काम, (5) वासना, (6) लज्जा, (7) कर्म, (8) ईर्ष्या, (9) इड़ा, (10) स्वप्न, (11) संघर्ष, (12) निर्वेद, (13) दर्शन, (14) रहस्य, (15) आनन्द। • आचार्य शांतिप्रिय द्विवेदी ने ‘कामायनी’ को छायावाद का उपनिषद् कहा है। • जयशंकर प्रसाद को प्रेम और सौन्दर्य का कवि माना जाता है। जयशंकर प्रसाद की महत्त्वपूर्ण काव्य कृतियाँ – उर्वशी (1909 ई.), वनमिलन (1909 ई.), प्रेमराज्य (1909 ई.), अयोध्या का उद्धार (1910 ई.), शोकोच्छवास (1910 ई.), कानन कुसुम (1913 ई.), प्रेमपथिक (1914 ई.), झरना (1918 ई.) आँसू (1925 ई.), लहर (1933 ई.) आदि।
B. जयशंकर प्रसाद कृत ‘कामायनी’ (1935 ई.) महाकाव्य है। इसमें 15 सर्ग हैं जिनका क्रम निम्नलिखित है– (1) चिन्ता, (2) आशा, (3) श्रद्धा, (4) काम, (5) वासना, (6) लज्जा, (7) कर्म, (8) ईर्ष्या, (9) इड़ा, (10) स्वप्न, (11) संघर्ष, (12) निर्वेद, (13) दर्शन, (14) रहस्य, (15) आनन्द। • आचार्य शांतिप्रिय द्विवेदी ने ‘कामायनी’ को छायावाद का उपनिषद् कहा है। • जयशंकर प्रसाद को प्रेम और सौन्दर्य का कवि माना जाता है। जयशंकर प्रसाद की महत्त्वपूर्ण काव्य कृतियाँ – उर्वशी (1909 ई.), वनमिलन (1909 ई.), प्रेमराज्य (1909 ई.), अयोध्या का उद्धार (1910 ई.), शोकोच्छवास (1910 ई.), कानन कुसुम (1913 ई.), प्रेमपथिक (1914 ई.), झरना (1918 ई.) आँसू (1925 ई.), लहर (1933 ई.) आदि।

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जयशंकर प्रसाद कृत ‘कामायनी’ (1935 ई.) महाकाव्य है। इसमें 15 सर्ग हैं जिनका क्रम निम्नलिखित है– (1) चिन्ता, (2) आशा, (3) श्रद्धा, (4) काम, (5) वासना, (6) लज्जा, (7) कर्म, (8) ईर्ष्या, (9) इड़ा, (10) स्वप्न, (11) संघर्ष, (12) निर्वेद, (13) दर्शन, (14) रहस्य, (15) आनन्द। • आचार्य शांतिप्रिय द्विवेदी ने ‘कामायनी’ को छायावाद का उपनिषद् कहा है। • जयशंकर प्रसाद को प्रेम और सौन्दर्य का कवि माना जाता है। जयशंकर प्रसाद की महत्त्वपूर्ण काव्य कृतियाँ – उर्वशी (1909 ई.), वनमिलन (1909 ई.), प्रेमराज्य (1909 ई.), अयोध्या का उद्धार (1910 ई.), शोकोच्छवास (1910 ई.), कानन कुसुम (1913 ई.), प्रेमपथिक (1914 ई.), झरना (1918 ई.) आँसू (1925 ई.), लहर (1933 ई.) आदि।