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Q: विशुद्धसत्त्वप्रधानया – अज्ञानसमष्ट्योपहितं चैतन्यं किं कथ्यते?
  • A. अव्यक्तमन्तर्यामीजगत्कारणमीश्वर:
  • B. प्राज्ञ:
  • C. जीव:
  • D. उपाधिमुक्तं विशुद्धचैतन्यम्
Correct Answer: Option A - विशुद्धसत्वप्रधानया- अज्ञानसमष्ट्योपहितं चैतन्यं ‘अव्यक्तमन्तर्यामीजगत्कारणमीश्वर:’ कथ्यते। अर्थात् विशुद्धसत्व प्रधानता से युक्त अज्ञान समष्टि (समुदाय या समूह) से उपहित (विशिष्ट) चैतन्य (समस्त अज्ञान राशि का प्रकाशक होने से सर्वज्ञता, सर्वेश्वरता, सर्व-नियामकता इत्यादि गुणों से युक्त) अव्यक्त, अन्तर्यामी जगत् का कारण और ईश्वर कहा जाता है। ‘य:सर्वज्ञ: सर्ववित्’ (मुण्डकोपनिषद्) ईश्वर की उपाधि-भूत यह अज्ञान-समष्टि सम्पूर्ण सूक्ष्म और स्थूल सृष्टि का कारण होने से ‘कारण-शरीर’ कही जाती है। तथा यह अज्ञान मलिनसत्व प्रधानता से युक्त व्यक्ति अविद्या की निकृष्ट उपाधि से विशिष्ट चैतन्य अल्पज्ञ, अनीश्वर गुणों से युक्त ‘प्राज्ञ’ कहलाता है और विज्ञानमयकोश से अवच्छिन्न चिदात्मा ही ‘मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं दु:खी हूँ, मैं सुखी हूँ, इत्यादि व्यवहार से ‘जीव’ कहलाता है।
A. विशुद्धसत्वप्रधानया- अज्ञानसमष्ट्योपहितं चैतन्यं ‘अव्यक्तमन्तर्यामीजगत्कारणमीश्वर:’ कथ्यते। अर्थात् विशुद्धसत्व प्रधानता से युक्त अज्ञान समष्टि (समुदाय या समूह) से उपहित (विशिष्ट) चैतन्य (समस्त अज्ञान राशि का प्रकाशक होने से सर्वज्ञता, सर्वेश्वरता, सर्व-नियामकता इत्यादि गुणों से युक्त) अव्यक्त, अन्तर्यामी जगत् का कारण और ईश्वर कहा जाता है। ‘य:सर्वज्ञ: सर्ववित्’ (मुण्डकोपनिषद्) ईश्वर की उपाधि-भूत यह अज्ञान-समष्टि सम्पूर्ण सूक्ष्म और स्थूल सृष्टि का कारण होने से ‘कारण-शरीर’ कही जाती है। तथा यह अज्ञान मलिनसत्व प्रधानता से युक्त व्यक्ति अविद्या की निकृष्ट उपाधि से विशिष्ट चैतन्य अल्पज्ञ, अनीश्वर गुणों से युक्त ‘प्राज्ञ’ कहलाता है और विज्ञानमयकोश से अवच्छिन्न चिदात्मा ही ‘मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं दु:खी हूँ, मैं सुखी हूँ, इत्यादि व्यवहार से ‘जीव’ कहलाता है।

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विशुद्धसत्वप्रधानया- अज्ञानसमष्ट्योपहितं चैतन्यं ‘अव्यक्तमन्तर्यामीजगत्कारणमीश्वर:’ कथ्यते। अर्थात् विशुद्धसत्व प्रधानता से युक्त अज्ञान समष्टि (समुदाय या समूह) से उपहित (विशिष्ट) चैतन्य (समस्त अज्ञान राशि का प्रकाशक होने से सर्वज्ञता, सर्वेश्वरता, सर्व-नियामकता इत्यादि गुणों से युक्त) अव्यक्त, अन्तर्यामी जगत् का कारण और ईश्वर कहा जाता है। ‘य:सर्वज्ञ: सर्ववित्’ (मुण्डकोपनिषद्) ईश्वर की उपाधि-भूत यह अज्ञान-समष्टि सम्पूर्ण सूक्ष्म और स्थूल सृष्टि का कारण होने से ‘कारण-शरीर’ कही जाती है। तथा यह अज्ञान मलिनसत्व प्रधानता से युक्त व्यक्ति अविद्या की निकृष्ट उपाधि से विशिष्ट चैतन्य अल्पज्ञ, अनीश्वर गुणों से युक्त ‘प्राज्ञ’ कहलाता है और विज्ञानमयकोश से अवच्छिन्न चिदात्मा ही ‘मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं दु:खी हूँ, मैं सुखी हूँ, इत्यादि व्यवहार से ‘जीव’ कहलाता है।