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Q: ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ – इनमें से किस विधा की रचना है?
  • A. रिपोर्ताज
  • B. व्यंग्य
  • C. कहानी
  • D. डायरी
Correct Answer: Option B - ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ इनमें से ‘व्यंग्य’ विधा की रचना है। ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ (1980 ई.) व्यंग्यात्मक निबंध-हरिशंकर परसाई जी का है। इस रचना पर इन्हें 1982 ई० में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। हरिशंकर परसाई का व्यंग्यात्मक निबन्ध संग्रह– पगडंडियों का जमाना (1966), जैसे उनके दिन फिरे (1963), सदाचार की ताबीज (1967), शिकायत मुझे भी है (1970), ठिठुरता हुआ गणतंत्र (1970), अपनी-अपनी बीमारी (1972), वैष्णवन की फिसलन (1967), विकलांग श्रद्धा का दौर (1980), भूत के पाँव पीछे, सुनो भाई साधो (1983), तुलसीदास चंदन घिसे (1986), कहत कबीर (1987), हँसते हैं रोते हैं, तब की बात और थी, पाखण्ड का अध्यात्म (1998), आवारा भीड़ के खतरे (1998), प्रेमचंद के फटे जूते।
B. ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ इनमें से ‘व्यंग्य’ विधा की रचना है। ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ (1980 ई.) व्यंग्यात्मक निबंध-हरिशंकर परसाई जी का है। इस रचना पर इन्हें 1982 ई० में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। हरिशंकर परसाई का व्यंग्यात्मक निबन्ध संग्रह– पगडंडियों का जमाना (1966), जैसे उनके दिन फिरे (1963), सदाचार की ताबीज (1967), शिकायत मुझे भी है (1970), ठिठुरता हुआ गणतंत्र (1970), अपनी-अपनी बीमारी (1972), वैष्णवन की फिसलन (1967), विकलांग श्रद्धा का दौर (1980), भूत के पाँव पीछे, सुनो भाई साधो (1983), तुलसीदास चंदन घिसे (1986), कहत कबीर (1987), हँसते हैं रोते हैं, तब की बात और थी, पाखण्ड का अध्यात्म (1998), आवारा भीड़ के खतरे (1998), प्रेमचंद के फटे जूते।

Explanations:

‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ इनमें से ‘व्यंग्य’ विधा की रचना है। ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ (1980 ई.) व्यंग्यात्मक निबंध-हरिशंकर परसाई जी का है। इस रचना पर इन्हें 1982 ई० में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। हरिशंकर परसाई का व्यंग्यात्मक निबन्ध संग्रह– पगडंडियों का जमाना (1966), जैसे उनके दिन फिरे (1963), सदाचार की ताबीज (1967), शिकायत मुझे भी है (1970), ठिठुरता हुआ गणतंत्र (1970), अपनी-अपनी बीमारी (1972), वैष्णवन की फिसलन (1967), विकलांग श्रद्धा का दौर (1980), भूत के पाँव पीछे, सुनो भाई साधो (1983), तुलसीदास चंदन घिसे (1986), कहत कबीर (1987), हँसते हैं रोते हैं, तब की बात और थी, पाखण्ड का अध्यात्म (1998), आवारा भीड़ के खतरे (1998), प्रेमचंद के फटे जूते।