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Q: ‘विग्रहवत्यपि अप्रत्यक्षदर्शना’ का?
  • A. तृष्णा
  • B. लक्ष्मी:
  • C. इन्द्रियराग:
  • D. लोलुपता
Correct Answer: Option B - ‘विग्रहवत्यपि अप्रत्यक्षदर्शना’ लक्ष्मी:। यह कथन शुकनासोपदेश से है। विग्रहवत्यपि अप्रत्यक्षदर्शना। पुरुषोत्तमरतापि खलजन प्रिया। रेणुमयीव स्वच्छमपि कलुषीकरोति। अर्थात् शरीर धारिणी होने पर भी आँखों से न दिखाई पड़ने वाली है। प्रेरक होने के कारण युद्ध कारिणी होते हुए भी आँखों से नहीं दिखाई पड़ती है, क्योंकि लक्ष्मी देवता है। उत्तम पुरुष में आसक्त होने पर भी दुष्ट जनों से प्रीति करती है (अर्थात् विष्णु में आसक्त रहती हुुई भी दुर्जनों को चाहती है, क्योंकि अधिकतर दुर्जनों के पास ही लक्ष्मी रहती है)। मानो धूलमयी होकर स्वच्छ को भी मलिन कर देती है। उपरोक्त कथन में विरोधाभास अलंकार है।
B. ‘विग्रहवत्यपि अप्रत्यक्षदर्शना’ लक्ष्मी:। यह कथन शुकनासोपदेश से है। विग्रहवत्यपि अप्रत्यक्षदर्शना। पुरुषोत्तमरतापि खलजन प्रिया। रेणुमयीव स्वच्छमपि कलुषीकरोति। अर्थात् शरीर धारिणी होने पर भी आँखों से न दिखाई पड़ने वाली है। प्रेरक होने के कारण युद्ध कारिणी होते हुए भी आँखों से नहीं दिखाई पड़ती है, क्योंकि लक्ष्मी देवता है। उत्तम पुरुष में आसक्त होने पर भी दुष्ट जनों से प्रीति करती है (अर्थात् विष्णु में आसक्त रहती हुुई भी दुर्जनों को चाहती है, क्योंकि अधिकतर दुर्जनों के पास ही लक्ष्मी रहती है)। मानो धूलमयी होकर स्वच्छ को भी मलिन कर देती है। उपरोक्त कथन में विरोधाभास अलंकार है।

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‘विग्रहवत्यपि अप्रत्यक्षदर्शना’ लक्ष्मी:। यह कथन शुकनासोपदेश से है। विग्रहवत्यपि अप्रत्यक्षदर्शना। पुरुषोत्तमरतापि खलजन प्रिया। रेणुमयीव स्वच्छमपि कलुषीकरोति। अर्थात् शरीर धारिणी होने पर भी आँखों से न दिखाई पड़ने वाली है। प्रेरक होने के कारण युद्ध कारिणी होते हुए भी आँखों से नहीं दिखाई पड़ती है, क्योंकि लक्ष्मी देवता है। उत्तम पुरुष में आसक्त होने पर भी दुष्ट जनों से प्रीति करती है (अर्थात् विष्णु में आसक्त रहती हुुई भी दुर्जनों को चाहती है, क्योंकि अधिकतर दुर्जनों के पास ही लक्ष्मी रहती है)। मानो धूलमयी होकर स्वच्छ को भी मलिन कर देती है। उपरोक्त कथन में विरोधाभास अलंकार है।