Correct Answer:
Option D - ‘वाच्य एव वाक्यार्थ:’ इति अन्विताभिधानवादिनां मतं अस्ति। ‘अन्विताभिधानवाद’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने वाले गुरु प्रभाकर वस्तुत: ‘अभिहितान्वयवादी’ कुमारिल भट्ट के शिष्य हैं। इनके अनुसार पदों के द्वारा अन्वित पदार्थों की ही उपस्थिति होती है इसलिए पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध रूप वाक्यार्थ वाच्य ही होता है। अर्थात् पहले से ‘अन्वित’ पदार्थों का ही अभिधा से बोधन होता है। इसलिए इस सिद्धान्त का नाम ‘अन्विताभिधानवाद’ रखा गया। लेकिन भट्ट मत में पहले पदों से अनन्वित पदार्थ उपस्थित होते हैं उसके बाद पदों की आकांक्षा, योग्यता तथा सन्निधि के बल से ‘तात्पर्या शक्ति’ द्वारा उन पदार्थों के परस्पर सम्बन्ध रूप वाक्यार्थ का बोध होता है। अत: प्रभाकर ‘अभिहितान्वयवाद’ का खण्डन करते हुए ‘वाच्य एव वाक्यार्थ’ कहते हुए अपना मत रखा है। आचार्य आनन्दवर्धन ‘ध्वनि’ को काव्य की आत्मा और आचार्य वामन ‘रीति’ को काव्य की आत्मा माना है।
D. ‘वाच्य एव वाक्यार्थ:’ इति अन्विताभिधानवादिनां मतं अस्ति। ‘अन्विताभिधानवाद’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने वाले गुरु प्रभाकर वस्तुत: ‘अभिहितान्वयवादी’ कुमारिल भट्ट के शिष्य हैं। इनके अनुसार पदों के द्वारा अन्वित पदार्थों की ही उपस्थिति होती है इसलिए पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध रूप वाक्यार्थ वाच्य ही होता है। अर्थात् पहले से ‘अन्वित’ पदार्थों का ही अभिधा से बोधन होता है। इसलिए इस सिद्धान्त का नाम ‘अन्विताभिधानवाद’ रखा गया। लेकिन भट्ट मत में पहले पदों से अनन्वित पदार्थ उपस्थित होते हैं उसके बाद पदों की आकांक्षा, योग्यता तथा सन्निधि के बल से ‘तात्पर्या शक्ति’ द्वारा उन पदार्थों के परस्पर सम्बन्ध रूप वाक्यार्थ का बोध होता है। अत: प्रभाकर ‘अभिहितान्वयवाद’ का खण्डन करते हुए ‘वाच्य एव वाक्यार्थ’ कहते हुए अपना मत रखा है। आचार्य आनन्दवर्धन ‘ध्वनि’ को काव्य की आत्मा और आचार्य वामन ‘रीति’ को काव्य की आत्मा माना है।