Correct Answer:
Option B - उपमानोपमेययोरभेदे सति अलज्ररो ‘रूपकम्’ भवति। जहाँ उपमेय में उपमान का भेदरहित आरोप होता है, वहाँ रूपक अलङ्कार होता है।
रूपकं रूपितारोपो विषये निरपह्नवे (साहित्यदर्पण) निरपह्नव अर्थात् अपह्नव (निषेध) रहित विषय (उपमेय) में रूपित आरोप को ही रूपक कहते हैं। यथा- पायं पायं वच: सुधाम्। यहाँ पानक्रिया में वचन के बजाय सुधा ही अन्वित होगी फलत: उपमेयभूत वचन, सुधा से अभिन्न होकर, पान-क्रिया से अन्वित हो रहा है। रूपक के भी साङ्ग, निरङ्ग तथा परम्परित और इन तीनों के भी अनेक प्रभेदों का व्याख्यान आचार्यों द्वारा किया गया है।
B. उपमानोपमेययोरभेदे सति अलज्ररो ‘रूपकम्’ भवति। जहाँ उपमेय में उपमान का भेदरहित आरोप होता है, वहाँ रूपक अलङ्कार होता है।
रूपकं रूपितारोपो विषये निरपह्नवे (साहित्यदर्पण) निरपह्नव अर्थात् अपह्नव (निषेध) रहित विषय (उपमेय) में रूपित आरोप को ही रूपक कहते हैं। यथा- पायं पायं वच: सुधाम्। यहाँ पानक्रिया में वचन के बजाय सुधा ही अन्वित होगी फलत: उपमेयभूत वचन, सुधा से अभिन्न होकर, पान-क्रिया से अन्वित हो रहा है। रूपक के भी साङ्ग, निरङ्ग तथा परम्परित और इन तीनों के भी अनेक प्रभेदों का व्याख्यान आचार्यों द्वारा किया गया है।