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Q: ‘उपकृष्णम्’ इति समस्त पदे किं सूत्रं प्रवृत्तम्?
  • A. यथाऽसादृश्ये
  • B. अव्ययीभावे चाकाले
  • C. अव्ययीभावश्च
  • D. यावदवधारणे
Correct Answer: Option C - ‘उपकृष्णम्’ इति समस्त पदे ‘अव्ययीभावश्च’ सूत्रं प्रवृत्तम्। ‘उपकृष्णम्’ इस समस्त पद में ‘अव्ययीभावश्च’ सूत्र प्रवृत्त हुआ है। अव्ययीभावश्च ।2।4।18- इस सूत्र के अनुसार अव्ययीभाव नपुंसक लिङ्ग में होता है। उप+कृष्ण (कृष्णस्य समीपम्) उपकृष्णम्। अव्ययीभावश्च सूत्र से नपुंसक लिङ्ग में करने पर = उपकृष्णम् बनेगा।। यथाऽसादृश्ये- असादृश्य एव यथाशब्द: समस्यते। अर्थात् सादृश्य भिन्न अर्थ में ही ‘यथा’ अव्यय का सुबन्त के साथ समास होता है। यथा- हरिस्तथा हर:- विष्णु के सदृश शिव यावदवधारणे- यावन्त श्लोकास्तावन्तोऽच्युतप्रमण:, यावच्छलोकम्। जब परिमाण निश्चय करना हो, तब ‘यावत्’ अव्यय का सुबन्त के साथ समास होता है। यथा-या वच्छ्लोकम् - जितने श्लोक हैं उतने ही विष्णु को अर्पित है। अव्ययीभावे चाकाले- यदि कालवाची शब्द उत्तरपद में न हो तो अव्ययीभाव समास में ‘सह’ के स्थान पर ‘स’ आदेश होता है। यथा · हरे: सादृश्यं-सहरि
C. ‘उपकृष्णम्’ इति समस्त पदे ‘अव्ययीभावश्च’ सूत्रं प्रवृत्तम्। ‘उपकृष्णम्’ इस समस्त पद में ‘अव्ययीभावश्च’ सूत्र प्रवृत्त हुआ है। अव्ययीभावश्च ।2।4।18- इस सूत्र के अनुसार अव्ययीभाव नपुंसक लिङ्ग में होता है। उप+कृष्ण (कृष्णस्य समीपम्) उपकृष्णम्। अव्ययीभावश्च सूत्र से नपुंसक लिङ्ग में करने पर = उपकृष्णम् बनेगा।। यथाऽसादृश्ये- असादृश्य एव यथाशब्द: समस्यते। अर्थात् सादृश्य भिन्न अर्थ में ही ‘यथा’ अव्यय का सुबन्त के साथ समास होता है। यथा- हरिस्तथा हर:- विष्णु के सदृश शिव यावदवधारणे- यावन्त श्लोकास्तावन्तोऽच्युतप्रमण:, यावच्छलोकम्। जब परिमाण निश्चय करना हो, तब ‘यावत्’ अव्यय का सुबन्त के साथ समास होता है। यथा-या वच्छ्लोकम् - जितने श्लोक हैं उतने ही विष्णु को अर्पित है। अव्ययीभावे चाकाले- यदि कालवाची शब्द उत्तरपद में न हो तो अव्ययीभाव समास में ‘सह’ के स्थान पर ‘स’ आदेश होता है। यथा · हरे: सादृश्यं-सहरि

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‘उपकृष्णम्’ इति समस्त पदे ‘अव्ययीभावश्च’ सूत्रं प्रवृत्तम्। ‘उपकृष्णम्’ इस समस्त पद में ‘अव्ययीभावश्च’ सूत्र प्रवृत्त हुआ है। अव्ययीभावश्च ।2।4।18- इस सूत्र के अनुसार अव्ययीभाव नपुंसक लिङ्ग में होता है। उप+कृष्ण (कृष्णस्य समीपम्) उपकृष्णम्। अव्ययीभावश्च सूत्र से नपुंसक लिङ्ग में करने पर = उपकृष्णम् बनेगा।। यथाऽसादृश्ये- असादृश्य एव यथाशब्द: समस्यते। अर्थात् सादृश्य भिन्न अर्थ में ही ‘यथा’ अव्यय का सुबन्त के साथ समास होता है। यथा- हरिस्तथा हर:- विष्णु के सदृश शिव यावदवधारणे- यावन्त श्लोकास्तावन्तोऽच्युतप्रमण:, यावच्छलोकम्। जब परिमाण निश्चय करना हो, तब ‘यावत्’ अव्यय का सुबन्त के साथ समास होता है। यथा-या वच्छ्लोकम् - जितने श्लोक हैं उतने ही विष्णु को अर्पित है। अव्ययीभावे चाकाले- यदि कालवाची शब्द उत्तरपद में न हो तो अव्ययीभाव समास में ‘सह’ के स्थान पर ‘स’ आदेश होता है। यथा · हरे: सादृश्यं-सहरि