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Q: धनस्य महत्तां कस्मिन् वाक्येऽकथयत् ?
  • A. सर्वे गुणा: काञ्चनमाश्रयन्ति
  • B. अर्थो हि कन्या परकीय एव
  • C. विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपात: शतमुख:
  • D. न हि गणयति क्षुद्रो जन्तु: परिग्रहफल्गुताम्
Correct Answer: Option A - धनस्य महत्तां ‘सर्वे गुणा: काञ्चनमाश्रयन्ति’ अस्मिन् वाक्ये अकथयत्। धन की महत्ता का ‘सभी गुण सोने में ही निहित रहते हैं।’ इस वाक्य में कहा गया है। ‘अर्थो हि कन्या परकीय एव-कन्या वस्तुत: पराया धन है (अभिज्ञानशाकुन्तलम्) विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपात:शतमुख:- जिनका विवेक भ्रष्ट हो गया है उनका पतन सैकड़ों प्रकार से होता है। न हि गणयति क्षुद्रो जन्तु: परिग्रहफल्गुताम्-नीच, अपनाई हुई वस्तु की तुच्छता की परवाह नहीं करता। स्वगृहीत वस्तु की क्षुद्रता पर ध्यान नहीं देता।
A. धनस्य महत्तां ‘सर्वे गुणा: काञ्चनमाश्रयन्ति’ अस्मिन् वाक्ये अकथयत्। धन की महत्ता का ‘सभी गुण सोने में ही निहित रहते हैं।’ इस वाक्य में कहा गया है। ‘अर्थो हि कन्या परकीय एव-कन्या वस्तुत: पराया धन है (अभिज्ञानशाकुन्तलम्) विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपात:शतमुख:- जिनका विवेक भ्रष्ट हो गया है उनका पतन सैकड़ों प्रकार से होता है। न हि गणयति क्षुद्रो जन्तु: परिग्रहफल्गुताम्-नीच, अपनाई हुई वस्तु की तुच्छता की परवाह नहीं करता। स्वगृहीत वस्तु की क्षुद्रता पर ध्यान नहीं देता।

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धनस्य महत्तां ‘सर्वे गुणा: काञ्चनमाश्रयन्ति’ अस्मिन् वाक्ये अकथयत्। धन की महत्ता का ‘सभी गुण सोने में ही निहित रहते हैं।’ इस वाक्य में कहा गया है। ‘अर्थो हि कन्या परकीय एव-कन्या वस्तुत: पराया धन है (अभिज्ञानशाकुन्तलम्) विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपात:शतमुख:- जिनका विवेक भ्रष्ट हो गया है उनका पतन सैकड़ों प्रकार से होता है। न हि गणयति क्षुद्रो जन्तु: परिग्रहफल्गुताम्-नीच, अपनाई हुई वस्तु की तुच्छता की परवाह नहीं करता। स्वगृहीत वस्तु की क्षुद्रता पर ध्यान नहीं देता।