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Q: The following programmes were launched by the nationalist against the partition of Bengal: बंगाल विभाजन के विरुद्ध राष्ट्रवादियों ने निम्नलिखित कार्यक्रम प्रारम्भ किये – (1) Boycott/बहिष्कार (2) Swadeshi/स्वदेशी (3) Non Co-operation/असहयोग (4) National education/राष्ट्रीय शिक्षा Select the correct answer :/ सही उत्तर चुनिये
  • A. 1,2 and 3/1, 2 एवं 3
  • B. 2,3 and 4/2, 3 एवं 4
  • C. 1,3 and 4/1, 3 एवं 4
  • D. 1,2 and 4/1, 2 एवं 4
Correct Answer: Option D - स्वदेशी आन्दोलन से गाँधी जी संबंधित नहीं है। लॉर्ड कर्जन द्वारा किये गये बंगाल-विभाजन के विरोध में स्वदेशी आन्दोलन 1905 ई. में शुरू हुआ था। 1905 ई. में बनारस में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में स्वदेशी एवं बहिष्कार आन्दोलन का समर्थन किया गया एवं वर्ष 1906 ई. में कलकत्ता अधिवेशन में स्वदेशी का प्रस्ताव पारित कर दिया गया। इस प्रस्ताव के साथ ही स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा सम्बन्धी नीति भी पारित किया गया। खिलाफत आन्दोलन - 23 नवम्बर, 1919 ई. को `दिल्ली' में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी का अधिवेशन हुआ, और गाँधीजी को इसका अध्यक्ष चुना गया, इनके सुझाव पर असहयोग व स्वदेशी की नीति अपनायी गयी। 1924 ई. में यह आन्दोलन उस समय समाप्त हो गया जब तुर्की के कमाल पाशा के नेतृत्व में बनी सरकार ने खलीफा के पद को समाप्त कर दिया। कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव के विरोध तथा युद्ध में अपने को अलग सिद्ध करने के लिए व्यक्तिगत सत्याग्रह आरम्भ किया एवं यह विचारधारा गाँधीजी की थी। व्यक्तिगत सत्याग्रह 17अक्टूबर, 1940 ई. में पवनार आश्रम (महाराष्ट्र) से शुरू किया गया तथा पहले सत्याग्रही विनोबा भावे थे। भारत छोड़ो आन्दोलन - भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की अंतिम लड़ाई थी, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव को हिलाकर रख दिया। जापान के बढ़ते हुए प्रभुत्व को देखकर 5 जुलाई, 1942 को गाँधीजी ने `हरिजन' में लिखा ``अंग्रेजों भारत को जापान के लिए मत छोड़ो, बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ।''
D. स्वदेशी आन्दोलन से गाँधी जी संबंधित नहीं है। लॉर्ड कर्जन द्वारा किये गये बंगाल-विभाजन के विरोध में स्वदेशी आन्दोलन 1905 ई. में शुरू हुआ था। 1905 ई. में बनारस में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में स्वदेशी एवं बहिष्कार आन्दोलन का समर्थन किया गया एवं वर्ष 1906 ई. में कलकत्ता अधिवेशन में स्वदेशी का प्रस्ताव पारित कर दिया गया। इस प्रस्ताव के साथ ही स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा सम्बन्धी नीति भी पारित किया गया। खिलाफत आन्दोलन - 23 नवम्बर, 1919 ई. को `दिल्ली' में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी का अधिवेशन हुआ, और गाँधीजी को इसका अध्यक्ष चुना गया, इनके सुझाव पर असहयोग व स्वदेशी की नीति अपनायी गयी। 1924 ई. में यह आन्दोलन उस समय समाप्त हो गया जब तुर्की के कमाल पाशा के नेतृत्व में बनी सरकार ने खलीफा के पद को समाप्त कर दिया। कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव के विरोध तथा युद्ध में अपने को अलग सिद्ध करने के लिए व्यक्तिगत सत्याग्रह आरम्भ किया एवं यह विचारधारा गाँधीजी की थी। व्यक्तिगत सत्याग्रह 17अक्टूबर, 1940 ई. में पवनार आश्रम (महाराष्ट्र) से शुरू किया गया तथा पहले सत्याग्रही विनोबा भावे थे। भारत छोड़ो आन्दोलन - भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की अंतिम लड़ाई थी, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव को हिलाकर रख दिया। जापान के बढ़ते हुए प्रभुत्व को देखकर 5 जुलाई, 1942 को गाँधीजी ने `हरिजन' में लिखा ``अंग्रेजों भारत को जापान के लिए मत छोड़ो, बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ।''

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स्वदेशी आन्दोलन से गाँधी जी संबंधित नहीं है। लॉर्ड कर्जन द्वारा किये गये बंगाल-विभाजन के विरोध में स्वदेशी आन्दोलन 1905 ई. में शुरू हुआ था। 1905 ई. में बनारस में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में स्वदेशी एवं बहिष्कार आन्दोलन का समर्थन किया गया एवं वर्ष 1906 ई. में कलकत्ता अधिवेशन में स्वदेशी का प्रस्ताव पारित कर दिया गया। इस प्रस्ताव के साथ ही स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा सम्बन्धी नीति भी पारित किया गया। खिलाफत आन्दोलन - 23 नवम्बर, 1919 ई. को `दिल्ली' में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी का अधिवेशन हुआ, और गाँधीजी को इसका अध्यक्ष चुना गया, इनके सुझाव पर असहयोग व स्वदेशी की नीति अपनायी गयी। 1924 ई. में यह आन्दोलन उस समय समाप्त हो गया जब तुर्की के कमाल पाशा के नेतृत्व में बनी सरकार ने खलीफा के पद को समाप्त कर दिया। कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव के विरोध तथा युद्ध में अपने को अलग सिद्ध करने के लिए व्यक्तिगत सत्याग्रह आरम्भ किया एवं यह विचारधारा गाँधीजी की थी। व्यक्तिगत सत्याग्रह 17अक्टूबर, 1940 ई. में पवनार आश्रम (महाराष्ट्र) से शुरू किया गया तथा पहले सत्याग्रही विनोबा भावे थे। भारत छोड़ो आन्दोलन - भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की अंतिम लड़ाई थी, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव को हिलाकर रख दिया। जापान के बढ़ते हुए प्रभुत्व को देखकर 5 जुलाई, 1942 को गाँधीजी ने `हरिजन' में लिखा ``अंग्रेजों भारत को जापान के लिए मत छोड़ो, बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ।''