search
Q: दिवस का अवसान समीप था गगन था कुछ लोहित हो चला तरु शिखा पर थी अब राजती कमलिनी–कुल–वल्लभ की प्रभा इस कविता में छन्द है –
  • A. वंशस्थ
  • B. द्रुतविलम्बित
  • C. दुर्मिल
  • D. वसन्ततिलका
Correct Answer: Option B - । । । ऽ । । ऽ। । ऽ। ऽ ‘दिवस का अवसान समीप था = 12 अक्षर गगन था कुछ लोहित हो चला। तरु शिखा पर थी अवराजती कमलिनी कुल वल्लभ की प्रभा। इस कविता में ‘द्रुतविलम्बित’ छंद है। द्रुत विलम्बित– इसका दूसरा नाम ‘सुन्दरी’ भी है। इसमें 12 अक्षर इन गणों के क्रम में रहते हैं– नगण, भगण, भगण, रगण। सूत्र–डन भ भ र –द्रुत़ वंशस्थ– यह समवर्णिक छंद है, इसका पूरा नाम ‘वंशस्थ विलम्’ है। इसमें १२ वर्ण एवं जगण, तगण, जगण, रगण होता है। । ऽ । ऽ ऽ ।। ऽ। ऽ। ऽ सगर्ण बोला तब कर्ण भूप से, = 12वर्ण अमान्य बोला तब कर्ण भूप से, परास्त होना रण पूर्ण शत्रु से, विचार्य है केवल बृद्ध बुद्धि से। दुर्मिल छंद : दुर्मिल सवैया छंद का दूसरा नाम ‘‘चंद्रकला’’ है। दुर्मिल छंद के प्रत्येक चरण में 24 वर्ण होते है। इसमें 4 चरण होते हैं। दुर्मिल छंद में 12-12 वर्ण पर यति होती है। इसमें 8 सगण (।।ऽ) होते हैं। उदाहरण : ‘‘सखि नील-नभस्सर में उतरा, यह हंस अहा तरता तरता। अब तारक-मौक्तिक शेष नहीं, निकला जिनको चरता चरता। अपने हिम-बिन्दु बचे तब भी, चलता उनको धरता धरता। गड़ जाय न कंटक भूतल के, कर डाल रहा डरता डरता। वसंततिलका छंद–वसंततिलका एक वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते है एवं 14वें वर्ण पर यति होती है। वसंततिलका छंद में तगण (ऽऽ।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।), जगण (।ऽ।) और 2 गुुरू (ऽऽ) होता है। ‘‘उक्ता वसंततिलका तभजा: जगौ ग:।’’ उदाहरण : मै पुण्य भारत घरा पर जन्म लेऊँ। संस्कार वैदिक मिले सब देव सेऊँ।। यज्ञोपवीत रखके नित नेम पालूँ। माथे लगा तिलक मैं रख गर्व चाखूँ।।
B. । । । ऽ । । ऽ। । ऽ। ऽ ‘दिवस का अवसान समीप था = 12 अक्षर गगन था कुछ लोहित हो चला। तरु शिखा पर थी अवराजती कमलिनी कुल वल्लभ की प्रभा। इस कविता में ‘द्रुतविलम्बित’ छंद है। द्रुत विलम्बित– इसका दूसरा नाम ‘सुन्दरी’ भी है। इसमें 12 अक्षर इन गणों के क्रम में रहते हैं– नगण, भगण, भगण, रगण। सूत्र–डन भ भ र –द्रुत़ वंशस्थ– यह समवर्णिक छंद है, इसका पूरा नाम ‘वंशस्थ विलम्’ है। इसमें १२ वर्ण एवं जगण, तगण, जगण, रगण होता है। । ऽ । ऽ ऽ ।। ऽ। ऽ। ऽ सगर्ण बोला तब कर्ण भूप से, = 12वर्ण अमान्य बोला तब कर्ण भूप से, परास्त होना रण पूर्ण शत्रु से, विचार्य है केवल बृद्ध बुद्धि से। दुर्मिल छंद : दुर्मिल सवैया छंद का दूसरा नाम ‘‘चंद्रकला’’ है। दुर्मिल छंद के प्रत्येक चरण में 24 वर्ण होते है। इसमें 4 चरण होते हैं। दुर्मिल छंद में 12-12 वर्ण पर यति होती है। इसमें 8 सगण (।।ऽ) होते हैं। उदाहरण : ‘‘सखि नील-नभस्सर में उतरा, यह हंस अहा तरता तरता। अब तारक-मौक्तिक शेष नहीं, निकला जिनको चरता चरता। अपने हिम-बिन्दु बचे तब भी, चलता उनको धरता धरता। गड़ जाय न कंटक भूतल के, कर डाल रहा डरता डरता। वसंततिलका छंद–वसंततिलका एक वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते है एवं 14वें वर्ण पर यति होती है। वसंततिलका छंद में तगण (ऽऽ।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।), जगण (।ऽ।) और 2 गुुरू (ऽऽ) होता है। ‘‘उक्ता वसंततिलका तभजा: जगौ ग:।’’ उदाहरण : मै पुण्य भारत घरा पर जन्म लेऊँ। संस्कार वैदिक मिले सब देव सेऊँ।। यज्ञोपवीत रखके नित नेम पालूँ। माथे लगा तिलक मैं रख गर्व चाखूँ।।

Explanations:

। । । ऽ । । ऽ। । ऽ। ऽ ‘दिवस का अवसान समीप था = 12 अक्षर गगन था कुछ लोहित हो चला। तरु शिखा पर थी अवराजती कमलिनी कुल वल्लभ की प्रभा। इस कविता में ‘द्रुतविलम्बित’ छंद है। द्रुत विलम्बित– इसका दूसरा नाम ‘सुन्दरी’ भी है। इसमें 12 अक्षर इन गणों के क्रम में रहते हैं– नगण, भगण, भगण, रगण। सूत्र–डन भ भ र –द्रुत़ वंशस्थ– यह समवर्णिक छंद है, इसका पूरा नाम ‘वंशस्थ विलम्’ है। इसमें १२ वर्ण एवं जगण, तगण, जगण, रगण होता है। । ऽ । ऽ ऽ ।। ऽ। ऽ। ऽ सगर्ण बोला तब कर्ण भूप से, = 12वर्ण अमान्य बोला तब कर्ण भूप से, परास्त होना रण पूर्ण शत्रु से, विचार्य है केवल बृद्ध बुद्धि से। दुर्मिल छंद : दुर्मिल सवैया छंद का दूसरा नाम ‘‘चंद्रकला’’ है। दुर्मिल छंद के प्रत्येक चरण में 24 वर्ण होते है। इसमें 4 चरण होते हैं। दुर्मिल छंद में 12-12 वर्ण पर यति होती है। इसमें 8 सगण (।।ऽ) होते हैं। उदाहरण : ‘‘सखि नील-नभस्सर में उतरा, यह हंस अहा तरता तरता। अब तारक-मौक्तिक शेष नहीं, निकला जिनको चरता चरता। अपने हिम-बिन्दु बचे तब भी, चलता उनको धरता धरता। गड़ जाय न कंटक भूतल के, कर डाल रहा डरता डरता। वसंततिलका छंद–वसंततिलका एक वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते है एवं 14वें वर्ण पर यति होती है। वसंततिलका छंद में तगण (ऽऽ।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।), जगण (।ऽ।) और 2 गुुरू (ऽऽ) होता है। ‘‘उक्ता वसंततिलका तभजा: जगौ ग:।’’ उदाहरण : मै पुण्य भारत घरा पर जन्म लेऊँ। संस्कार वैदिक मिले सब देव सेऊँ।। यज्ञोपवीत रखके नित नेम पालूँ। माथे लगा तिलक मैं रख गर्व चाखूँ।।