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Q: दक्षिण बिहार में प्रचलित परम्परागत जल संरक्षण सिंचाई पद्धति कहलाती है?
  • A. आहर-पाइन
  • B. लोहा-पाइन
  • C. ढलवाँ-पाइन
  • D. गहन-पाइन
Correct Answer: Option A - दक्षिण बिहार में प्रचलित परम्परागत जल संरक्षण सिंचाई पद्धति को आहर-पाइन कहते हैं। यह पद्धति प्राचीन काल से प्रचलित है। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार बिहार में 117.54 लाख हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता है। बिहार में मुख्य सिंचाई के साधन नहर, तालाब, नलकूप और कुआँ है। 2022-23 के आँकड़े के अनुसार में वृहद एवं मध्यम सिंचाई परियोजना क्रमश: 37.38 लाख हेक्टेयर/एवं 25004 लाख हेक्टेयर में सिंचाई हो पाई थी।
A. दक्षिण बिहार में प्रचलित परम्परागत जल संरक्षण सिंचाई पद्धति को आहर-पाइन कहते हैं। यह पद्धति प्राचीन काल से प्रचलित है। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार बिहार में 117.54 लाख हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता है। बिहार में मुख्य सिंचाई के साधन नहर, तालाब, नलकूप और कुआँ है। 2022-23 के आँकड़े के अनुसार में वृहद एवं मध्यम सिंचाई परियोजना क्रमश: 37.38 लाख हेक्टेयर/एवं 25004 लाख हेक्टेयर में सिंचाई हो पाई थी।

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दक्षिण बिहार में प्रचलित परम्परागत जल संरक्षण सिंचाई पद्धति को आहर-पाइन कहते हैं। यह पद्धति प्राचीन काल से प्रचलित है। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार बिहार में 117.54 लाख हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता है। बिहार में मुख्य सिंचाई के साधन नहर, तालाब, नलकूप और कुआँ है। 2022-23 के आँकड़े के अनुसार में वृहद एवं मध्यम सिंचाई परियोजना क्रमश: 37.38 लाख हेक्टेयर/एवं 25004 लाख हेक्टेयर में सिंचाई हो पाई थी।