Correct Answer:
Option B - ‘‘तुम वहन कर सको जन-मन में मेरे विचार,
वाणी मेरी, चाहिए तुम्हें क्या अलंकार।’’ ये पंक्तियाँ सुमित्रानंदन पंत की ‘ग्राम्या’ कृति से उद्धृत की गयी हैं।
सुमित्रानन्दन पंत के काव्य को विद्वानों ने चार चरणों में बाँटा है जो निम्न है–
छायावादी– उच्छ्वास (1920 ई.), ग्रंथि (1920 ई.), वीणा (1927 ई.), पल्लव (1928 ई.), गुंजन (1932 ई.)।
प्रगतिवादी– युगान्त (1936 ई.), युगवाणी (1939 ई.), ग्राम्या (1940 ई.)।
अन्तश्चेतनावादी– उत्तरा (1949 ई.), स्वर्ण किरण (1947 ई.), स्वर्ण धूलि (1947 ई.), युगपथ (1949 ई.)।
नवमानवतावादी– कला और बूढ़ा चाँद (1959 ई.), अतिमा (1955 ई.), लोकायतन (1964 ई.), चिदम्बरा (1958), सत्यकाम (1975)।
B. ‘‘तुम वहन कर सको जन-मन में मेरे विचार,
वाणी मेरी, चाहिए तुम्हें क्या अलंकार।’’ ये पंक्तियाँ सुमित्रानंदन पंत की ‘ग्राम्या’ कृति से उद्धृत की गयी हैं।
सुमित्रानन्दन पंत के काव्य को विद्वानों ने चार चरणों में बाँटा है जो निम्न है–
छायावादी– उच्छ्वास (1920 ई.), ग्रंथि (1920 ई.), वीणा (1927 ई.), पल्लव (1928 ई.), गुंजन (1932 ई.)।
प्रगतिवादी– युगान्त (1936 ई.), युगवाणी (1939 ई.), ग्राम्या (1940 ई.)।
अन्तश्चेतनावादी– उत्तरा (1949 ई.), स्वर्ण किरण (1947 ई.), स्वर्ण धूलि (1947 ई.), युगपथ (1949 ई.)।
नवमानवतावादी– कला और बूढ़ा चाँद (1959 ई.), अतिमा (1955 ई.), लोकायतन (1964 ई.), चिदम्बरा (1958), सत्यकाम (1975)।