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Q: शिशुपालवधमहाकाव्यस्य प्रथमे सर्गे किं छन्द: प्रयुक्तम्?
  • A. अनुष्टुप्
  • B. वसन्ततिलका
  • C. उपजाति:
  • D. वंशस्थम्
Correct Answer: Option D - शिशुपालवधमहाकाव्यस्य प्रथम-सर्गे ‘वंशस्थम्’ छन्द: प्रयुक्तम्। शिशुपालवधम् महाकाव्य के प्रथम सर्ग में मुख्यत: वंशस्थ छन्द प्रयोग हुआ है। शिशुपालवधम् महाकाव्य के लेखक माघ है। शिशुपालवधम् के प्रथम सर्ग में 75 श्लोक हैं। इसमें 73 श्लोक तक वंशस्थ का प्रयोग हुआ है तथा 74वें श्लोक में पुष्पिताग्रा, 75वें श्लोक में शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। शिशुपालवधम् के प्रथम सर्ग का कथानक- देवर्षि नारद का द्वारका में आगमन, कृष्ण द्वारा उनका सत्कार, नारद द्वारा शिशुपाल के पूर्वजन्मों तथा उनके अत्याचारों का वर्णन शिशुपाल को मारने के लिए प्रेरित करना। वंशस्थ छन्द का लक्षण- जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ। वंशस्थ छन्द के प्रत्येक पाद में 12 वर्ण होते हैं। ये वर्ण क्रम इस प्रकार से है- जगण, तगण, जगण और रगण के रूप में होते हैं। अनुष्टुप् छन्द का लक्षण- श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्। द्विचतुष्पादयोह्र्रस्वं, सप्तमं दीर्घमन्ययो:।। वसन्ततिलका का लक्षण- उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ ग:। उपजाति छन्द का लक्षण- अनन्तरोदीरित लक्ष्मभाजौ, पादौ यदीयावुपजातयस्या:।
D. शिशुपालवधमहाकाव्यस्य प्रथम-सर्गे ‘वंशस्थम्’ छन्द: प्रयुक्तम्। शिशुपालवधम् महाकाव्य के प्रथम सर्ग में मुख्यत: वंशस्थ छन्द प्रयोग हुआ है। शिशुपालवधम् महाकाव्य के लेखक माघ है। शिशुपालवधम् के प्रथम सर्ग में 75 श्लोक हैं। इसमें 73 श्लोक तक वंशस्थ का प्रयोग हुआ है तथा 74वें श्लोक में पुष्पिताग्रा, 75वें श्लोक में शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। शिशुपालवधम् के प्रथम सर्ग का कथानक- देवर्षि नारद का द्वारका में आगमन, कृष्ण द्वारा उनका सत्कार, नारद द्वारा शिशुपाल के पूर्वजन्मों तथा उनके अत्याचारों का वर्णन शिशुपाल को मारने के लिए प्रेरित करना। वंशस्थ छन्द का लक्षण- जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ। वंशस्थ छन्द के प्रत्येक पाद में 12 वर्ण होते हैं। ये वर्ण क्रम इस प्रकार से है- जगण, तगण, जगण और रगण के रूप में होते हैं। अनुष्टुप् छन्द का लक्षण- श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्। द्विचतुष्पादयोह्र्रस्वं, सप्तमं दीर्घमन्ययो:।। वसन्ततिलका का लक्षण- उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ ग:। उपजाति छन्द का लक्षण- अनन्तरोदीरित लक्ष्मभाजौ, पादौ यदीयावुपजातयस्या:।

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शिशुपालवधमहाकाव्यस्य प्रथम-सर्गे ‘वंशस्थम्’ छन्द: प्रयुक्तम्। शिशुपालवधम् महाकाव्य के प्रथम सर्ग में मुख्यत: वंशस्थ छन्द प्रयोग हुआ है। शिशुपालवधम् महाकाव्य के लेखक माघ है। शिशुपालवधम् के प्रथम सर्ग में 75 श्लोक हैं। इसमें 73 श्लोक तक वंशस्थ का प्रयोग हुआ है तथा 74वें श्लोक में पुष्पिताग्रा, 75वें श्लोक में शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। शिशुपालवधम् के प्रथम सर्ग का कथानक- देवर्षि नारद का द्वारका में आगमन, कृष्ण द्वारा उनका सत्कार, नारद द्वारा शिशुपाल के पूर्वजन्मों तथा उनके अत्याचारों का वर्णन शिशुपाल को मारने के लिए प्रेरित करना। वंशस्थ छन्द का लक्षण- जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ। वंशस्थ छन्द के प्रत्येक पाद में 12 वर्ण होते हैं। ये वर्ण क्रम इस प्रकार से है- जगण, तगण, जगण और रगण के रूप में होते हैं। अनुष्टुप् छन्द का लक्षण- श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्। द्विचतुष्पादयोह्र्रस्वं, सप्तमं दीर्घमन्ययो:।। वसन्ततिलका का लक्षण- उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ ग:। उपजाति छन्द का लक्षण- अनन्तरोदीरित लक्ष्मभाजौ, पादौ यदीयावुपजातयस्या:।