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Q: श्रोत्रेन्द्रियेण शब्दस्य प्रत्यक्षं ज्ञानं भवति–
  • A. संयोगसन्निकर्षेण
  • B. समवायसन्निकर्षेण
  • C. संयुक्तसमवायसन्निकर्षेण
  • D. विशेष्यविशेषणभावसन्निकर्षेण
Correct Answer: Option B - श्रोत्रेन्द्रियेण शब्दस्य प्रत्यक्षं ज्ञानं समवाय सन्निकर्षेण भवति। अर्थात् श्रोत्रेन्द्रिय से शब्द का प्रत्यक्ष ज्ञान समवाय सन्निकर्ष से होता है। अत: प्रत्यक्ष ज्ञान कराने वाले निमित्त भूत इन्द्रिय तथा अर्थ का जो सन्निकर्ष होता है, वह छ: प्रकार का है- (1) संयोग (2) संयुक्त समवाय (3) संयुक्तसमवेत समवाय (4) समवाय (5) समवेतसमवाय और (6) विशेषण-विशेष्य भाव जब श्रोत्र (कर्णविवर के मध्य आकाश) इन्द्रिय से शब्द का ग्रहण होता है, तब श्रोत्र (आकाश) इन्द्रिय और शब्द अर्थ (विषय) होता है और इन दोनों का सन्निकर्ष समवाय सन्निकर्ष कहलाता है, अर्थात् आकाश (श्रोत्र) गुणी है और शब्द समवाय सम्बन्ध से आकाश में रहने वाला गुण है अत: गुण-गुणी का सन्निकर्ष समवाय सन्निकर्ष ही है। अत: चक्षु से घट का संयोग सन्निकर्ष, घटगत:पादि (शुक्ल, कृष्ण) का संयुक्त समवाय, घटरूप में रूपत्वादि सामान्य का संयुक्तसमवेतसमवाय, तथा श्रोत्र से शब्द में समवाय सन्निकर्ष तथा शब्दत्वादि सामान्य में समवेतसमवाय सन्निकर्ष, इन्द्रिय से अभाव का विशेषण-विशेष्य भाव सन्निकर्ष होता है।
B. श्रोत्रेन्द्रियेण शब्दस्य प्रत्यक्षं ज्ञानं समवाय सन्निकर्षेण भवति। अर्थात् श्रोत्रेन्द्रिय से शब्द का प्रत्यक्ष ज्ञान समवाय सन्निकर्ष से होता है। अत: प्रत्यक्ष ज्ञान कराने वाले निमित्त भूत इन्द्रिय तथा अर्थ का जो सन्निकर्ष होता है, वह छ: प्रकार का है- (1) संयोग (2) संयुक्त समवाय (3) संयुक्तसमवेत समवाय (4) समवाय (5) समवेतसमवाय और (6) विशेषण-विशेष्य भाव जब श्रोत्र (कर्णविवर के मध्य आकाश) इन्द्रिय से शब्द का ग्रहण होता है, तब श्रोत्र (आकाश) इन्द्रिय और शब्द अर्थ (विषय) होता है और इन दोनों का सन्निकर्ष समवाय सन्निकर्ष कहलाता है, अर्थात् आकाश (श्रोत्र) गुणी है और शब्द समवाय सम्बन्ध से आकाश में रहने वाला गुण है अत: गुण-गुणी का सन्निकर्ष समवाय सन्निकर्ष ही है। अत: चक्षु से घट का संयोग सन्निकर्ष, घटगत:पादि (शुक्ल, कृष्ण) का संयुक्त समवाय, घटरूप में रूपत्वादि सामान्य का संयुक्तसमवेतसमवाय, तथा श्रोत्र से शब्द में समवाय सन्निकर्ष तथा शब्दत्वादि सामान्य में समवेतसमवाय सन्निकर्ष, इन्द्रिय से अभाव का विशेषण-विशेष्य भाव सन्निकर्ष होता है।

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श्रोत्रेन्द्रियेण शब्दस्य प्रत्यक्षं ज्ञानं समवाय सन्निकर्षेण भवति। अर्थात् श्रोत्रेन्द्रिय से शब्द का प्रत्यक्ष ज्ञान समवाय सन्निकर्ष से होता है। अत: प्रत्यक्ष ज्ञान कराने वाले निमित्त भूत इन्द्रिय तथा अर्थ का जो सन्निकर्ष होता है, वह छ: प्रकार का है- (1) संयोग (2) संयुक्त समवाय (3) संयुक्तसमवेत समवाय (4) समवाय (5) समवेतसमवाय और (6) विशेषण-विशेष्य भाव जब श्रोत्र (कर्णविवर के मध्य आकाश) इन्द्रिय से शब्द का ग्रहण होता है, तब श्रोत्र (आकाश) इन्द्रिय और शब्द अर्थ (विषय) होता है और इन दोनों का सन्निकर्ष समवाय सन्निकर्ष कहलाता है, अर्थात् आकाश (श्रोत्र) गुणी है और शब्द समवाय सम्बन्ध से आकाश में रहने वाला गुण है अत: गुण-गुणी का सन्निकर्ष समवाय सन्निकर्ष ही है। अत: चक्षु से घट का संयोग सन्निकर्ष, घटगत:पादि (शुक्ल, कृष्ण) का संयुक्त समवाय, घटरूप में रूपत्वादि सामान्य का संयुक्तसमवेतसमवाय, तथा श्रोत्र से शब्द में समवाय सन्निकर्ष तथा शब्दत्वादि सामान्य में समवेतसमवाय सन्निकर्ष, इन्द्रिय से अभाव का विशेषण-विशेष्य भाव सन्निकर्ष होता है।