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Q: शुकनासोपदेशस्य वचनमत्र–
  • A. तृष्णा-विष-मूच्र्छिता: कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ति
  • B. हस्तेलीलाकमलमलके बालकुन्दानुविद्धम्
  • C. बोद्धारो मत्सरग्रस्ता: प्रभव: स्मयदूषिता:
  • D. हितं मनोहारि च दुर्लभं वच:
Correct Answer: Option A - शुकनासोपदेशस्य वचनमत्र- तृष्णा-विष-मूच्र्छिता: कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ति। तृष्णा अर्थात् प्यास या विषयों के प्रति लालसा रूपी विष से मोहित हुए (राजा लोग) प्रत्येक वस्तु को स्वर्ण-निर्मित (सोने से बनी हुई) सी देखने लगते हैं। हस्तेलीलाकमलमलके बालकुन्दानुविद्धम् - मेघदूतम्। बोद्धारो मत्सरग्रस्ता: प्रभव: स्मयदूषिता: - नीतिशतकम्। हितं मनोहारि च दुर्लभं वच: - किरातार्जुनीयम्
A. शुकनासोपदेशस्य वचनमत्र- तृष्णा-विष-मूच्र्छिता: कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ति। तृष्णा अर्थात् प्यास या विषयों के प्रति लालसा रूपी विष से मोहित हुए (राजा लोग) प्रत्येक वस्तु को स्वर्ण-निर्मित (सोने से बनी हुई) सी देखने लगते हैं। हस्तेलीलाकमलमलके बालकुन्दानुविद्धम् - मेघदूतम्। बोद्धारो मत्सरग्रस्ता: प्रभव: स्मयदूषिता: - नीतिशतकम्। हितं मनोहारि च दुर्लभं वच: - किरातार्जुनीयम्

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शुकनासोपदेशस्य वचनमत्र- तृष्णा-विष-मूच्र्छिता: कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ति। तृष्णा अर्थात् प्यास या विषयों के प्रति लालसा रूपी विष से मोहित हुए (राजा लोग) प्रत्येक वस्तु को स्वर्ण-निर्मित (सोने से बनी हुई) सी देखने लगते हैं। हस्तेलीलाकमलमलके बालकुन्दानुविद्धम् - मेघदूतम्। बोद्धारो मत्सरग्रस्ता: प्रभव: स्मयदूषिता: - नीतिशतकम्। हितं मनोहारि च दुर्लभं वच: - किरातार्जुनीयम्