Correct Answer:
Option A - शुकनासोपदेशस्य वचनमत्र- तृष्णा-विष-मूच्र्छिता: कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ति। तृष्णा अर्थात् प्यास या विषयों के प्रति लालसा रूपी विष से मोहित हुए (राजा लोग) प्रत्येक वस्तु को स्वर्ण-निर्मित (सोने से बनी हुई) सी देखने लगते हैं।
हस्तेलीलाकमलमलके बालकुन्दानुविद्धम् - मेघदूतम्।
बोद्धारो मत्सरग्रस्ता: प्रभव: स्मयदूषिता: - नीतिशतकम्।
हितं मनोहारि च दुर्लभं वच: - किरातार्जुनीयम्
A. शुकनासोपदेशस्य वचनमत्र- तृष्णा-विष-मूच्र्छिता: कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ति। तृष्णा अर्थात् प्यास या विषयों के प्रति लालसा रूपी विष से मोहित हुए (राजा लोग) प्रत्येक वस्तु को स्वर्ण-निर्मित (सोने से बनी हुई) सी देखने लगते हैं।
हस्तेलीलाकमलमलके बालकुन्दानुविद्धम् - मेघदूतम्।
बोद्धारो मत्सरग्रस्ता: प्रभव: स्मयदूषिता: - नीतिशतकम्।
हितं मनोहारि च दुर्लभं वच: - किरातार्जुनीयम्