Correct Answer:
Option B - वक्रोक्ति अलंकार-जहाँ पर वक्ता के कथन का श्रोता द्वारा वक्ता के अभिप्रेत आशय से श्लेष अथवा काकु उक्ति से भिन्न अर्थ लगाया जाय वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है। वक्रोक्ति में शब्द के दो अर्थ होते हैं।
जैसे- गौरव शालिनी प्यारी हमारी, सदा तुमही एक इष्ट अहो।
हौ न गऊ, नहीं हौं अवशा, अलिनीहूँ नहीं, अस काहे कहे।।
श्लेष अलंकार-श्लेष का अर्थ है- चिपकना,मिलना अथवा संयोग। जहाँ एक शब्द के साथ अनेक अर्थ चिपके रहते हैं वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
जैसे- मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ
जा तन की झाई परै स्याम हरित दुति होय।।
अनुप्रास अलंकार- जहाँ वर्णो या व्यंजनों की सम्यता के आधार पर एक से अधिक बार आवृत्ति हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
जैसे- मुदित महीपति मन्दिर आए। सेवक सचिव सुभन्त बुलाए।।
उत्प्रेक्षा अलंकार-जब उपमेय में उपमान की सम्भावना या कल्पना कर ली जाये, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।
जैसे- सोहत ओढ़े पीत पट स्याम सलोने गात।
मनो नील मनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात।।
B. वक्रोक्ति अलंकार-जहाँ पर वक्ता के कथन का श्रोता द्वारा वक्ता के अभिप्रेत आशय से श्लेष अथवा काकु उक्ति से भिन्न अर्थ लगाया जाय वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है। वक्रोक्ति में शब्द के दो अर्थ होते हैं।
जैसे- गौरव शालिनी प्यारी हमारी, सदा तुमही एक इष्ट अहो।
हौ न गऊ, नहीं हौं अवशा, अलिनीहूँ नहीं, अस काहे कहे।।
श्लेष अलंकार-श्लेष का अर्थ है- चिपकना,मिलना अथवा संयोग। जहाँ एक शब्द के साथ अनेक अर्थ चिपके रहते हैं वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
जैसे- मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ
जा तन की झाई परै स्याम हरित दुति होय।।
अनुप्रास अलंकार- जहाँ वर्णो या व्यंजनों की सम्यता के आधार पर एक से अधिक बार आवृत्ति हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
जैसे- मुदित महीपति मन्दिर आए। सेवक सचिव सुभन्त बुलाए।।
उत्प्रेक्षा अलंकार-जब उपमेय में उपमान की सम्भावना या कल्पना कर ली जाये, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।
जैसे- सोहत ओढ़े पीत पट स्याम सलोने गात।
मनो नील मनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात।।