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Q: स्वामी दयानंद सरस्वती 1. देवी एवं देवताओं की मूर्ति पूजा के विरूद्ध थे। 2. वेदों को अमोघ मानते थे। 3. ईश्वर चंद्र विद्यासागर से मिले थे और उनसे विचार-विमर्श किया था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन से सही है?
  • A. 1, 2 और 3
  • B. केवल 2 और 3
  • C. केवल 1 और 3
  • D. केवल 1 और 2
Correct Answer: Option A - स्वामी दयानन्द ने 1875 ई. में आर्य-समाज की स्थापना की। वे देवी एवं देवताओं की मूर्ति पूजा के विरूद्ध थे। वेदों को अमोघ मानते थे तथा वेदों के पुनरूत्थान का श्रेय भी दिया जाता है। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर से मिले थे और उनसे विचार-विमर्श किया था। आर्य-समाज केवल वेदों को ही स्वतंत्र और अंतिम शब्द स्वीकार किये और वेदों से ही प्रेरणा ली तथा वेद ही सत्य-ज्ञान के स्रोत है। उन्होंने मूर्ति-पूजा का खंडन किया, तीर्थयात्रा और अवतारवाद का विरोध किया। कर्म और पुनर्जन्म अथवा जीवन के आवागमन के सिद्धांत में विश्वास करते थे। ‘वेदों की ओर चलो’ नारा स्वामी दयानंद सरस्वती ने दिया था।
A. स्वामी दयानन्द ने 1875 ई. में आर्य-समाज की स्थापना की। वे देवी एवं देवताओं की मूर्ति पूजा के विरूद्ध थे। वेदों को अमोघ मानते थे तथा वेदों के पुनरूत्थान का श्रेय भी दिया जाता है। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर से मिले थे और उनसे विचार-विमर्श किया था। आर्य-समाज केवल वेदों को ही स्वतंत्र और अंतिम शब्द स्वीकार किये और वेदों से ही प्रेरणा ली तथा वेद ही सत्य-ज्ञान के स्रोत है। उन्होंने मूर्ति-पूजा का खंडन किया, तीर्थयात्रा और अवतारवाद का विरोध किया। कर्म और पुनर्जन्म अथवा जीवन के आवागमन के सिद्धांत में विश्वास करते थे। ‘वेदों की ओर चलो’ नारा स्वामी दयानंद सरस्वती ने दिया था।

Explanations:

स्वामी दयानन्द ने 1875 ई. में आर्य-समाज की स्थापना की। वे देवी एवं देवताओं की मूर्ति पूजा के विरूद्ध थे। वेदों को अमोघ मानते थे तथा वेदों के पुनरूत्थान का श्रेय भी दिया जाता है। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर से मिले थे और उनसे विचार-विमर्श किया था। आर्य-समाज केवल वेदों को ही स्वतंत्र और अंतिम शब्द स्वीकार किये और वेदों से ही प्रेरणा ली तथा वेद ही सत्य-ज्ञान के स्रोत है। उन्होंने मूर्ति-पूजा का खंडन किया, तीर्थयात्रा और अवतारवाद का विरोध किया। कर्म और पुनर्जन्म अथवा जीवन के आवागमन के सिद्धांत में विश्वास करते थे। ‘वेदों की ओर चलो’ नारा स्वामी दयानंद सरस्वती ने दिया था।