Correct Answer:
Option D - ‘स्मरीष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन् कथा प्रमत्त: प्रथमं कृतामिव’ यह पंक्ति दुर्वासा ने कहा है।
‘‘विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपोधनं वेत्सि न मामुपस्थितम्।
स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन् कथां प्रमत्त: प्रथमं कृतामिव।।
अर्थात् एकाग्रचित्तवाली जिसका चिन्तन करती हुई (यहाँ) उपस्थित मुझ तपस्वी को नहीं जान (देख) पा रही हो, वह (तेरे द्वारा) स्मरण दिलाये जाने पर भी तुमको (उसी प्रकार) स्मरण नहीं करेगा। (जिस प्रकार) उन्मत्त (व्यक्ति) पहले की कही गयी बात को स्मरण नहीं करता है।
यह श्लोक अभिज्ञान शाकुन्तलम् के चतुर्थ अङ्क से उद्धृत है।
D. ‘स्मरीष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन् कथा प्रमत्त: प्रथमं कृतामिव’ यह पंक्ति दुर्वासा ने कहा है।
‘‘विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपोधनं वेत्सि न मामुपस्थितम्।
स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन् कथां प्रमत्त: प्रथमं कृतामिव।।
अर्थात् एकाग्रचित्तवाली जिसका चिन्तन करती हुई (यहाँ) उपस्थित मुझ तपस्वी को नहीं जान (देख) पा रही हो, वह (तेरे द्वारा) स्मरण दिलाये जाने पर भी तुमको (उसी प्रकार) स्मरण नहीं करेगा। (जिस प्रकार) उन्मत्त (व्यक्ति) पहले की कही गयी बात को स्मरण नहीं करता है।
यह श्लोक अभिज्ञान शाकुन्तलम् के चतुर्थ अङ्क से उद्धृत है।