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Q: सामाजिक सुधार से संबंधित दयानंद के विचारों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. दयानंद के सुधार ने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था पर विचार किया था, जहाँ विभिन्न जातियों को योग्यता के आधार पर निर्धारित अपनी स्थिति के अनुरूप कार्यों का संपादन करना था। 2. दयानंद के ‘सन्तुलित (खरे) वैदिक प्रतिरूप’ ने आर्यावर्त को वशीभूत कर लेने वाले पुरुषोचित (बलवान) पश्चिम को चुनौती दी थी। उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
  • A. केवल 1
  • B. केवल 2
  • C. 1 और 2 दोनों
  • D. न तो 1, न ही 2
Correct Answer: Option C - दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज (1875) हिन्दू धर्म का एक सुधारवादी आंदोलन था जिसका उद्देश्य प्राचीन वैदिक धर्म को शुद्ध रूप से पुन: स्थापित करना था। उन्होंने जातिरहित, वर्गरहित समाज की कल्पना की तथा हिन्दू धर्म की रूढि़वादिता, जातिगत कठोरता अस्पृश्यता, पुरोहितवाद की कड़ी आलोचना की। दयानंद के सुधार ने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था पर विचार किया था, जहाँ विभिन्न जातियों को योग्यता के आधार पर तथा अपनी स्थिति के अनुरूप कार्य करने की अनुमति थी। इनके संतुलित (खरे) वैदिक प्रतिरूप (robust Vedic counterpart) ने आर्यावर्त को वशीभूत कर लेने वाले पुरुषोचित (बलवान) पश्चिम को चुनौती दी थी।
C. दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज (1875) हिन्दू धर्म का एक सुधारवादी आंदोलन था जिसका उद्देश्य प्राचीन वैदिक धर्म को शुद्ध रूप से पुन: स्थापित करना था। उन्होंने जातिरहित, वर्गरहित समाज की कल्पना की तथा हिन्दू धर्म की रूढि़वादिता, जातिगत कठोरता अस्पृश्यता, पुरोहितवाद की कड़ी आलोचना की। दयानंद के सुधार ने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था पर विचार किया था, जहाँ विभिन्न जातियों को योग्यता के आधार पर तथा अपनी स्थिति के अनुरूप कार्य करने की अनुमति थी। इनके संतुलित (खरे) वैदिक प्रतिरूप (robust Vedic counterpart) ने आर्यावर्त को वशीभूत कर लेने वाले पुरुषोचित (बलवान) पश्चिम को चुनौती दी थी।

Explanations:

दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज (1875) हिन्दू धर्म का एक सुधारवादी आंदोलन था जिसका उद्देश्य प्राचीन वैदिक धर्म को शुद्ध रूप से पुन: स्थापित करना था। उन्होंने जातिरहित, वर्गरहित समाज की कल्पना की तथा हिन्दू धर्म की रूढि़वादिता, जातिगत कठोरता अस्पृश्यता, पुरोहितवाद की कड़ी आलोचना की। दयानंद के सुधार ने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था पर विचार किया था, जहाँ विभिन्न जातियों को योग्यता के आधार पर तथा अपनी स्थिति के अनुरूप कार्य करने की अनुमति थी। इनके संतुलित (खरे) वैदिक प्रतिरूप (robust Vedic counterpart) ने आर्यावर्त को वशीभूत कर लेने वाले पुरुषोचित (बलवान) पश्चिम को चुनौती दी थी।