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Q: सांख्यदर्शनानुसारं केषां वृत्ति:आलोचनमात्रम् इष्यते?
  • A. ज्ञानेन्द्रियाणाम्
  • B. कर्मेन्द्रियाणाम्
  • C. तन्मात्राणाम्
  • D. पुरुषाणाम्
Correct Answer: Option A - सांख्यदर्शनानुसारं ज्ञानेन्द्रियाणां वृत्ति: आलोचनमात्रम् इष्यते। अर्थात् सांख्यदर्शनानुसार ज्ञानेन्द्रियों की वृत्ति (व्यापार) आलोचनमात्र है। शब्दादि के सन्निहित होने पर, पाँच ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा किया जाने वाला जो (निर्विकल्पक ज्ञानरूप) आलोचनमात्र है, वही उनका आलोचनमात्र व्यापार है, और वागादि पाँच कर्मेन्द्रियों के असाधारण व्यापार क्रमश: वचन, आदान गमन, उत्सर्ग और आनन्द माने जाते हैं। अत: विकल्प (a) सही है, ज्ञानेन्द्रियाँ शब्दादि (शब्द, स्पर्श, रूप रस तथा गन्ध) पञ्चतन्मात्र को अपना विषय बनाती हैं तथा पुरुष इन सभी पदार्थों का भोक्ता होता है। शब्दादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्ति:। वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाश्च पञ्चानाम् ।।28।।
A. सांख्यदर्शनानुसारं ज्ञानेन्द्रियाणां वृत्ति: आलोचनमात्रम् इष्यते। अर्थात् सांख्यदर्शनानुसार ज्ञानेन्द्रियों की वृत्ति (व्यापार) आलोचनमात्र है। शब्दादि के सन्निहित होने पर, पाँच ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा किया जाने वाला जो (निर्विकल्पक ज्ञानरूप) आलोचनमात्र है, वही उनका आलोचनमात्र व्यापार है, और वागादि पाँच कर्मेन्द्रियों के असाधारण व्यापार क्रमश: वचन, आदान गमन, उत्सर्ग और आनन्द माने जाते हैं। अत: विकल्प (a) सही है, ज्ञानेन्द्रियाँ शब्दादि (शब्द, स्पर्श, रूप रस तथा गन्ध) पञ्चतन्मात्र को अपना विषय बनाती हैं तथा पुरुष इन सभी पदार्थों का भोक्ता होता है। शब्दादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्ति:। वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाश्च पञ्चानाम् ।।28।।

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सांख्यदर्शनानुसारं ज्ञानेन्द्रियाणां वृत्ति: आलोचनमात्रम् इष्यते। अर्थात् सांख्यदर्शनानुसार ज्ञानेन्द्रियों की वृत्ति (व्यापार) आलोचनमात्र है। शब्दादि के सन्निहित होने पर, पाँच ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा किया जाने वाला जो (निर्विकल्पक ज्ञानरूप) आलोचनमात्र है, वही उनका आलोचनमात्र व्यापार है, और वागादि पाँच कर्मेन्द्रियों के असाधारण व्यापार क्रमश: वचन, आदान गमन, उत्सर्ग और आनन्द माने जाते हैं। अत: विकल्प (a) सही है, ज्ञानेन्द्रियाँ शब्दादि (शब्द, स्पर्श, रूप रस तथा गन्ध) पञ्चतन्मात्र को अपना विषय बनाती हैं तथा पुरुष इन सभी पदार्थों का भोक्ता होता है। शब्दादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्ति:। वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाश्च पञ्चानाम् ।।28।।